Tuesday, April 21, 2020

सांस्कृतिक विभाग, संगमेश्वर कॉलेज,सोलापूर


🎭🎭 अहवाल 2019-20 🎭🎭
 सांस्कृतिक विभाग,
 संगमेश्वर कॉलेज सोलापूर.

   संगमेश्वर कॉलेज मधील सांस्कृतिक विभाग नावलौकिक प्राप्त असा विभाग आहे. संगमेश्वर कॉलेजने विद्यापीठाच्या विविध सांस्कृतिक स्पर्धेमध्ये भाग घेऊन आपला वेगळा ठसा उमटवला आहे. या महाविद्यालयाच्या सांस्कृतिक विभागाने अनेक गुणी कलावंत गायक यांना त्यांच्या त्यांच्या क्षेत्रात नावलौकिक मिळवण्यास मदत केली आहे.
  दि. 31/08/2019  रोजी दरवर्षीप्रमाणे सांस्कृतिक विभागाच्या उद्घाटनाचा कार्यक्रम आयोजित केला होता. या उद्घाटन समारंभास झी मराठी हास्य सम्राट प्रा.दीपक देशपांडे प्रमुख पाहुणे होते.  पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होळकर सोलापूर विद्यापीठाच्या  विद्यार्थी विकास मंडळाचे संचालक डॉ.प्रो.वसंत कोरे अध्यक्ष म्हणून उपस्थित होते. या उद्घाटन समारंभात संगमेश्वर महाविद्यालयाच्या माजी विद्यार्थी श्री.संगमेश्वर बिराजदार याचा  राष्ट्रीय स्तरवर बक्षीस मिळवल्या प्रित्यर्थ सत्कार करण्यात आला. तसेच डॉ.वसंत कोरे यांची विद्यापीठाच्या विद्यार्थी विकास संचालक पदी नियुक्ती झाल्याबद्दल त्यांचाही सत्कार करण्यात आला. या समारंभात प्रा.दीपक देशपांडे यांनी कला व विविध अभिनयाद्वारे विद्यार्थ्यांना कलेतील बारकावे समजावून सांगितले. या समारंभात महाविद्यालयाच्या प्रज्ञा  नियतकालिकास प्रथम पुरस्कार मिळाल्या या अनुषंगाने संपादक डॉ.प्रोफे.सुहास पुजारी यांचा सन्मान करण्यात आला.
या शैक्षणिक वर्षात महाविद्यालयातील सांस्कृतिक विभागातील कलाकारांनी विविध स्पर्धेमध्ये सहभाग नोंदवला.
  दिनांक 3 जानेवारी 2020 ला संगमेश्वर महाविद्यालयामध्ये आयोजित SAN उत्सवात  विविध स्पर्धेमध्ये सहभाग नोंदवला. त्यांना पथनाट्य या स्पर्धेत रु.1500 द्वितीय बक्षीस मिळाले.
तसेच दिनांक 26 फेब्रुवारी 2020 ला ब्रह्मदेव दादा माने टेक्निकल इन्स्टिट्यूट येथे  आयोजित केल्या गेलेल्या पथनाट्य स्पर्धेत  रु. 3000 चा प्रथम क्रमांक प्राप्त झाला.
  सोलापूर विद्यापीठातर्फे दि.19 ते 22 सप्टेंबर 2019 रोजी लोकमंगल जैविक महाविद्यालय, वडाळा येथे आयोजित सोळाव्या युवा महोत्सवात महाविद्यालयांने सहभाग नोंदविला. या युवा महोत्सवात महाविद्यालयाला खालील प्रमाणे बक्षिसे प्राप्त झाली. युवा महोत्सवातील विविध स्पर्धेसाठी  महेश शिरसागर¸संतोष कुमठाळे, विश्वेश्वरय्या स्वामी, संगमेश्वर बिराजदार,  केंगार सर, प्रसाद विभुते यांनी मार्गदर्शन केले.सांस्कृतिक विभाग प्रमुख म्हणून डॉ.दादासाहेब खांडेकर यांनी काम पाहिले. 
संगमेश्वर कॉलेज,सोलापुर
एकूण गुण 37
क्रमांक चतुर्थ
1) मुकनाट्य-प्रथम

2) पथनाट्य-तृतीय

3) नकला-तृतीय ( अभिषेक चंदोले )

4) एकांकिका-अभिनय स्त्री- द्वितीय( विशाखा चव्हाण )

5) लोकनृत्य- द्वितीय

6) समूह गायन-प्रथम

7) शास्त्रीय गायन-द्वितीय ( अपूर्वा ओक )

8) फोटोग्राफी-द्वितीय ( विपुल मिरजकर)

9) शोभायात्रा-द्वितीय (सर्व संघ)
(अभिषेक चांडोले¸ बुद्धभूषण काटे¸ रती कसबे¸ रेश्मा गौडा¸ मदीहा होटगिकर¸ प्रतीक्षा पोतदार¸ संपदा व्हनखडे¸ विपुल मिरजकर¸ ऋतुजा पवार¸ विशाखा चव्हाण¸ वैभवी घोडके¸  श्रेया मसळी¸ आरती श्रीगोंडा¸ निलिशा अक्कलवाडे¸ सुजित पवार¸ धर्मराज गौडगाव¸ रमेश गाडे¸ देवराव खजिनदार¸ निकिता पारधे¸ दिव्या सूर्यवंशी¸ हृतिक कुरले¸ प्राजक्ता धुमाळी¸ अनिकेत पाटील¸ सिद्धेश्वर मलाबदे¸ राणी ताकमोगे¸ समर्थ पत्की¸ शिवराज गंजाळे¸ श्रीधर गायकवाड¸ पियुष कुलकर्णी¸ अनिकेत कुलकर्णी¸ शिव जहागीरदार¸ रुपाली अर्धाले.)
लोकनृत्य- द्वितीय (बुद्धभूषण काटे¸ रती कसबे¸ विशाखा चव्हाण¸ वैभवी घोडके¸ श्रेया मसळी¸ निलिशा अक्कलवाडे¸ सुजित पवार¸ धर्मराज गौडगाव¸ रमेश गाडे,आरती श्रीगोंदा.)
मुकनाट्य-प्रथम (अभिषेक चांडोले¸ बुद्धभूषण काटे¸ आरती श्रीगोंडा¸ देवराव खजिनदार¸ सिद्धेश्वर मलाबदे¸ हृतिक कुरले.)

झी मराठी हास्य सम्राट प्रा.दीपक देशपांडे मार्गदर्शन करतांना.




देशपांडे सरांच्या कार्यक्रमास असी गर्दी राहणारच. खचाखच भरलेला हॉल.

पथनाट्य-तृतीय (अभिषेक चांडोले¸ बुद्धभूषण काटे¸ निलिशा अक्कलवाडे¸ देवराव खजिनदार¸ दिव्या सूर्यवंशी¸ हृतिक कुरले¸ प्राजक्ता धुमाळी¸ अनिकेत पाटील¸ निकिता पारधे¸ धर्मराज गौडगाव.)
संगमेश्वर कॉलेज¸ संघ (युथ फेस्टिवल)
समूह गायन-प्रथम (मदीहा होटगिकर¸प्रतीक्षा पोतदार¸संपदा व्हनकडे¸रती कसबे,रेश्मा गौडा.)

स्टेज वर जाण्यात व बक्षीस घेण्यात एक वेगळीच मजा असते.


स्कीट (लघुनाटिका) एक मजेशीर कलाप्रकार 


मा. प्राचार्य डॉ.शोभा राजमान्य यांचेबरोबर एक क्षण .


पथनाट्य 


मा. सचिव, संगमेश्वर शिक्षण संस्था यांचे बरोबर.


स्पर्ध्येठीकानी सहज काढलेला एक फोटो.


सोबती संतोष, विश्वेश्वरय्या, महेश 


कमेटी मधील एक क्षण.




Friday, April 17, 2020

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’-भिक्षुक

2) भिक्षुक- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
कवि परिचय
सूर्यकांत त्रिपाठी जी का जन्म बंगाल के महिषादल नामक रियासत ( राज्य) के मेदिनीपुर में सन 21 फरवरी 1896 रविवार के दिन हुआ था जो बसंत पंचमी का दिन था। इनके पिता पंडित राम सहाय त्रिपाठी थे। ‘निराला’ यह सूर्यकांत त्रिपाठी जी का उपनाम है। इसी नाम से प्रसिद्ध रहे। निराला जी की आरंभिक शिक्षा बँगला में ही हुई। संस्कृत,बँगला,अंग्रेजी,हिंदी आदि भाषाओं का ज्ञान निरंतर अध्ययन से अवगत किया।निराला जी की दर्शन और संगीत में रुचि थी। 14 वर्ष की आयु में इनका विवाह मनोहरादेवी से हुआ। इन्हें एक पुत्री थी जिसका नाम सरोज रहा। प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात फैली महामारी में पत्नी तथा परिवार के अन्य सदस्यों की मृत्यु हुई थी। अर्थाभाव के कारण उनका संपूर्ण जीवन बहुत ही एकाकी और संघर्षपूर्ण रहा। सबसे अधिक दुख उन्हें उनकी पुत्री सरोज की मृत्यु से हुआ। निराला जी ने अपने जीवन में सिद्धांतों का त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया।  निराला जी छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। अपनी रचनाओं में उन्होंने यथार्थ को अधिक महत्व दिया। निरालाजी मुक्त छंद के प्रवर्तक रहे हैं। इनकी मृत्यु इलाहाबाद में 15 अक्टूबर 1961 में हुई। निराला जी की काव्य रचनाएं अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अनिमा, बेला, नए पत्ते, आराधना, वर्षा गीत, आदि रहे हैं। वह समन्वय तथा मतवाला के संपादक भी थे। आपने साहित्य गगन में अनेक कविता के सिवा उपन्यास, कहानी, रेखाचित्र आदि विधाओं में भी लेखन  कार्य किया है। एक आलोचक भी थे। निराला की चतुरी चमार कहानी बिलेश्वर बकहीरा रेखाचित्र तथा अप्सरा, निरुपमा, काले कारनामे, चोटी की पकड़ आदि उपन्यास चर्चित रहे।


प्रश्न:-  सूर्यकांत त्रिपाठी’ निराला’ की ‘भिक्षुक’ कविता में भिक्षुक का चित्रण किस प्रकार हुआ है?
उत्तर:- भिक्षुक कविता में निराला जी ने भिखारी की दीनता का बड़ा मार्मिक तथा हृदय स्पर्शी चित्रण किया है। जो यथार्थवादी रहा है। इस कविता में भिखारी की करुण दशा, सहजता, स्वाभाविकता का तथा वास्तविकता का चित्रण किया है। भिक्षुक निराला की प्रगतिवादी श्रेष्ठ कविता रही है जो पाठकों को चिंतन करने एवं सोचने के लिए प्रेरित करती है।
भिक्षुक निराला की प्रगतिवादी कविता है। निराला मूलतः छायावादी कवि थे लेकिन इस कविता से उन्होंने प्रगतिवादी कविता लिखना आरंभ किया। रास्ते पर भटकते एक भिखारी को भीख मांगते हुए जब वे देखते हैं तो उनके मन में उस भिखारी  के प्रति संवेदना पैदा होती है और वह उसकी दशा का वर्णन करने लगते हैं। एक भिखारी को जब भी भीख मांगते देखते हैं तो उनकी दीन-हीन दशा देखकर उनके कलेजे के टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं। वह अपनी दीन-हीन अवस्था को देखकर पश्चाताप करने लगता है। वह लाठी के सहारे धीरे-धीरे चलता है। उसकी पीठ और पेट एक हो गए हैं यानी कि वह कई दिनों से भूखा है। थोड़े से भोजन के लिए उसे दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है। उसके हाथ में एक फटी पुरानी झोली है। जिसे वह सबके सामने फैलाते हुआ भीख मांग रहा है ताकि वह अपना पेट भर सके। यह देखकर कवि का हृदय चीर-चीर हो जाता है। वह दरिद्रता को देखकर पछताता रहता है। 
सड़क पर चलते भिखारी के साथ उसके दो बच्चे भी हैं। वे बाएँ हाथ से अपने पेट को मलते हुए चल रहे हैं और दाहिने हाथ से आते जाते हुए लोगों से कुछ पाने के लिए हाथ फैलाए मांग रहे हैं। भूख से होंठ सूख गए हैं तो वे अपने ही आंसुओं को पी कर रह जाते हैं। ऐसा लगता है मानो उन बच्चों की दशा को देखकर किसी को दया नहीं आती है और किसी से उनको खाने के लिए कुछ भी नहीं मिलता। अतः कवि उनकी दशा को देखकर द्रवित हो जाता है।
भूख से व्याकुल भिखारी और उसके दोनों बच्चे जब मार्ग से गुजरते हैं तो सड़क किनारे जूठी  पत्तल को देखकर उनके उनसे रहा नहीं जाता। और वे अपनी भूख को मिटाने के लिए वह सड़क पर पड़े हुए उन्हें जूठी पत्तलों को चाटते हैं। वह भी गली के कुत्तों के साथ जूठी पत्तलों को  चाटने के लिए लड़ने लगते हैं। कवि यह देखकर दुखी हो जाता है। कवि का हृदय इस बात के लिए चिंतित हो जाता है कि वह उनके दुख दर्द को बांटेगा और उनका दर्द दूर करेगा। 
कवि इस कविता में भिखारी के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करता है।


भिक्षुक
वह आता-
 दो टूक कलेजे के करता पछताता
 पथ पर आता।
 पेट पीठ दोनों मिलकर है एक
 चल रहा  लकुटिया टेक,
 मुट्ठी भर दाने को- भूख मिटाने को
 मुंह फटी पुरानी झोली को फैलाता-
 दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। 
 सात दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,
बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,
 और दाहिना दया दृष्टि पाने की ओर बढ़ाएं। 
 भूख से सुख  होंठ जब जाते
 दाता भाग्य विधाता से क्या पाते?
   घूंट आंसुओं के पीकर रह जाते। 
 चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए
 और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी है अड़े हुए! 

Sunday, April 12, 2020

मैथिलीशरण गुप्त-शिक्षा की अवस्था

शिक्षा की अवस्था-मैथिलीशरण गुप्त


कवि परिचय-
मैथिली शरण गुप्त का जन्म 1886 में उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के चिरगांव में हुआ। गुप्त जी का परिवार प्रतिष्ठित वैष्णव परिवार रहा है। इनके पिता का नाम राम चरण था जिन्हें ‘कनकलता’ नाम से भी पहचाना जाता था। जो एक कवि थे। गुप्तजी बचपन से ही कविता करते थे। गुप्त जी का मन पाठशाला में नहीं लगता था। अतः इन्होंने घर पर ही बंगाली, मराठी, संस्कृत आदि भाषाओं का सम्यक ज्ञान प्राप्त किया। महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रेरणा एवं प्रोत्साहन से इनकी लेखनी प्रबल हुई तथा काव्य सृजन होता रहा। गुप्त जी में राष्ट्रीय चेतना भरी थी जिससे उन्हें राष्ट्र कवि कहा गया।आगरा विश्वविद्यालय ने आपको साहित्य सेवाओं पर डि.लीट. मानद उपाधि प्रदान की। राष्ट्रकवि यह उपाधि आपको महात्मा गांधी से मिली थी। सन 1954 में भारत सरकार ने आप को ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया था। आप स्वतंत्र भारत की राज्यसभा के दो बार मनोनीत सदस्य भी रहे थे। आप का देहावसान 12 सितंबर 1964 में हुआ। गुप्त जी ने द्विवेदी युग से लिखना शुरू किया था। आपकी ख्याति के मुख्य आधार साकेत, द्वापर, जयभारत, विष्णुप्रिया, भारत भारती, जयद्रथ वध, यशोधरा, पंचवटी,  नहुष, विपथगा, रंग में भंग आदि है। जिनका हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान है।
शिक्षा की अवस्था कविता के माध्यम से गुप्त जी ने हमें सजग किया है। वर्तमान में शिक्षा या ज्ञान प्राप्त करने के मार्ग बहुत ही क्लिष्ट बन चुके हैं। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े बड़े-बड़े लोगों का ध्यान विशिष्ट है जिसमें शिक्षा दूरस्थ है। वह कहते हैं कि पूर्वजों के सद्गुणों को ध्यान में रखकर चिंतन करें। पूर्वजों के सद्गुणों से जो परास्त होंगे उन्हें मानव जाति में रहने का अधिकार नहीं है। गुप्त जी नींद से जागने का आलस्य को त्यागने का सजग रहने का इशारा देते हैं वरना सर्वस्व नष्ट होने के भय को भी दर्शाते हैं। अंत में कहते हैं कि कोई भी कार्य एकता से होता है जैसे शून्य के योग से ही एक अंक का दस बन जाता है। 
प्रस्तुत कविता में कवि ने आज-कल की उच्च शिक्षा-व्यवस्था पर चिंता प्रकट की है। कवि का कहना है कि आज शिक्षा का मार्ग संकीर्ण हो गया है। उच्च शिक्षा लेने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है है। विश्वविद्यालयों के कुलपति और विश्वविद्यालयों का ध्यान भी शिक्षा क्षेत्र से हट कर अन्य बातों में लगा हुआ है। आज वही उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकता है जिसके पास धन है। गरीब या सामान्य परिवार के छात्र उच्च शिक्षा से दूर रहे हैं। जो अमीर है वही अच्छे महाविद्यालय में प्रवेश प्राप्त कर सकते हैं जिनके पास शुल्क मतलब फ़ीस देने के लिए पैसा नहीं है उनको अनपढ़ ही रहना होगा। कवि  कहते हैं पूर्वजों के सद्गुणों को याद करते हुए स्वार्थी वृद्धि का त्याग कर अपने आप पर चिंतन करना चाहिए। जिनको अपने पूर्वजों पर गर्व नहीं वह समाज मृत समाज जैसा हो जाता है और मृत समाज किसी काम का नहीं होता। देश की उन्नति के लिए जागृत समाज की आवश्यकता होती है। सदियों से अन्याय सहन करने वाले समाज को कवि जागृत करने का प्रयास करते हुए कहता है अब तक तुम बहुत सोए अगर आज भी नहीं जागोगे तो तुम्हारा कभी भी भला नहीं होगा। आलसी वृत्ति का त्याग करके अपनी दशा का अवलोकन करो। तुमने अपना सब कुछ खो दिया है। अगर इस हालात से उबरना है तो जागना होगा। जागृत व्यक्ति समाज में उलटफेर कभी भी ला सकता है।
कवि के अनुसार समाज को अपना उद्धार करने के लिए जागृत होना जरूरी है और उसके लिए एकता की आवश्यकता है। एकता में शक्ति होती है और वह शक्ति बहुत कुछ उलटफेर कर सकती है। एक एक  मिलकर ग्यारह हो जाते हैं। शून्य मिलाकर भी अंकों का मूल्य दस गुना बढ़ जाता है। 
कवि मैथिलीशरण गुप्त जी राष्ट्र प्रेमी कवि रहे हैं। देश की शिक्षा व्यवस्था की सोचनीय हालत उनसे देखे नहीं जाती। जिस देश की शिक्षा व्यवस्था अमीरों तक सीमित है उस देश का विकास असंभव है। शिक्षा निचले तबके तक आनी चाहिए। सरकार को इसका ध्यान रखना जरूरी होता है कि कोई भी प्रतिभावान केवल गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित ना रहे। अगर सरकार सोई है तो समाज को जागना जरूरी है। तभी सरकार की बुद्धि ठिकाने पर आ जाएगी। कवि हक के लिए लड़ने की आवश्यकता प्रतिपादित करता है और इसके लिए एकता का महत्व स्पष्ट करता है। एक होने से हक मिलता है। अकेले-अकेले की आवाज़ किसी के कान पर नहीं पड़ती इसलिए समूह को साथ साथ खड़ा होना जरूर है जरूरी है।  एकी से सब कुछ हो जाता है। 

शिक्षा की अवस्था 

हाँ! आज शिक्षा मार्ग भी संकीर्ण होकर क्लिष्ट है,
 कुलपति- सहित उन गुरुकुलों का ध्यान भी अवशिष्ट है।
 बिकने लगी विद्या यहां अब, शक्ति हो तो क्रय करो,
 यदि शुल्क आदि ना दे सको तो मूर्ख बनकर ही मरो।

निज पूर्वजों उनके सद्गुणों को यत्न से मन में धरो,
 सब आत्म- परीभव -भाव तज निज रूप का चिंतन करो।
निज पूर्वजों के सद्गुणों का गर्व जोर रखती नहीं,
 वह जाती जीवित जातियों में रह नहीं सकती कहीं।

हे भाइयों सोए बहुत अब तो उठो, जागो अहो!
 देखो जरा अपनी दशा, आलस्य को त्यागो अहो!
कुछ पार है, क्या-क्या समय उलट-फेर ना हो चुके!
 अब भी सजग होगे न क्या? सर्वस्व तो बुक हो चुके!

 हाय कार्य ऐसा कौन-सा साधे न जिसको एकता?
 देती नहीं अद्भुत अलौकिक शक्ति किसको एकता?
दो एक  एकादश हुए, कितने नहीं देखे सुने?
 हां, शून्य के भी योग से है अंक होते दस गुने !

बी.ए. भाग- 2 विषय -हिंदी ‘काव्या लोक’ सत्र -4 पेपर- 6

Tuesday, April 7, 2020

आधुनिक हिंदी कविता



आधुनिक हिंदी कविता


आधुनिक शब्द अंग्रेजी के मॉडर्न (modern) शब्द का हिंदी पर्याय है। यह शब्द दो अर्थों को सूचित करता है- मध्यकाल से भिन्नता और नवीन इहलौकिक दृष्टिकोण की सूचना। अगर हम पहले अर्थ की दृष्टि से देखें तो आधुनिक काल में साहित्य मध्यकाल एवं रीतिकाल के बंधे हुए घाटों से मुक्त होकर मनुष्य के वृहत्तर सुख दुख के साथ पहली बार जुड़ जाता है। और मॉडर्न इस दूसरे अर्थ के अनुसार आधुनिक काल में धर्म,दर्शन,साहित्य आदि सभी के प्रति नए दृष्टिकोण का आविर्भाव हुआ। इस युग में मनुष्य अपनी अलग अलग समस्याओं के प्रति सजग हुआ। आधुनिक शब्द मनुष्य के सोचने विचार करने के स्तर से संबंधित है। आधुनिक शब्द को संकुचित अर्थ मेंसमसामयिकभी पहचानते हैं। समसामयिकशब्द की दृष्टि से देखा जाए तो आधुनिक का अर्थ है जो वर्तमान में जीता है, वर्तमान को भोगता है और परंपरा का विरोध भी करता है। इस अर्थ में आधुनिक व्यक्ति कुछ खास नारों, वादों और स्थितियों के प्रति पक्षपातपूर्ण रुख अपनाता है।
          आधुनिक हिंदी कविता का आरंभ भारतेंदु काल से माना जाता है। भारतेंदु काल से साठोत्तरी कविता तक हिंदी कविता में अलग-अलग धाराएँ प्रवाहित हुई। हिंदी कविता का रूप बदलना उस काल की परिस्थितियों की प्रतिक्रिया थी। भारतेंदु कालीन कविता में देश प्रेम,राष्ट्रवाद की जो झलक दिखाई देती है उसके लिए उस समय की सामाजिक,राजनीतिक परिस्थिति कारण थी। स्वातंत्र्योत्तर काल में देश की नवचेतना नवनिर्माण में संलग्न हुई। परिणाम स्वरूप हिंदी काव्य में भी परिवर्तन आता गया। इस काल में देश की राजनीतिक,सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों में विशेष परिवर्तन हुए। जिसका असर साहित्य पर भी पड़ा। परिणाम स्वरूप  इस काल का साहित्य विषय और शैली दोनों दृष्टियों से अपने पूर्ववर्ती साहित्य से भिन्न हो गया। साधारणत: आधुनिक हिंदी कविता का काल विभाजन करते समय निम्नलिखित भेद किए जाते हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए इन्हें निम्नलिखित सोपानों में विभाजित किया जा सकता है-
         
1. भारतेंदु युग -1950 से 1900 ई.
          2. द्विवेदी युग- 1900 से 1920 ई.
          3. छायावादी युग 1920 से 1936 ई. 
4. प्रगतिवादी युग 1936 से 1943 ई. 
5. प्रयोगवादी युग 1943 से 1954 ई. 
6. नई कविता 1954 से 1960 ई. 
7. साठोत्तरी कविता 1960 से अब तक
1. भारतेंदु युग -1950 से 1900 ई.
       आधुनिक हिंदी कविता का सूत्रपात भारतेंदु युग से होता है। अतः भारतेंदु युग आधुनिक हिंदी कविता का प्रवेश द्वार माना जाता है। इस युग में जहाँ एक और प्राचीन हिंदी कविता की परंपराओं का निर्वाह किया गया वहाँ दूसरी ओर जनसामान्य को केंद्र बनाकर कविता के क्षेत्र में कुछ नए विषयों का ग्रहण भी हुआ। इस युग के कवि समाज सुधारक, पत्रकार और प्रचारक अधिक थे। इसलिए इनकी कविताओं में समाज सुधार, देश भक्ति, नवजागरण, हास्य-व्यंग्यात्मकता, इतिवृत्त्तात्मकता आदि  प्रवृत्तियां दिखाई देती है। 
           इस युग के प्रमुख कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र, बद्रीनारायण चौधरीप्रेमघन’, पंडित अंबिका दत्त व्यास, जगन्नाथदासरत्नाकर’, वियोगी हरि आदि है।
2. द्विवेदी युग- 1900 से 1920 ई.
       द्विवेदी युग राष्ट्रीय आंदोलन तथा नवजागरण का युग रहा है। अतः इस युग कोजागरण-सुधार-कालयासुधारवादी युगके नाम से भी अभिहित किया जाता है। भारतेंदु काल में जिस राष्ट्रीयता और समाज सुधार की भावना का सूत्रपात हुआ था द्विवेदी युग में उसका विकास हुआ। उस काल की कविताओं में स्वतंत्रता प्रेम जनमानस में निर्माण करने का कार्य किया। राष्ट्रीयता की भावना,समाज सुधार,आध्यात्मिकता और मानवता,बौद्धिकता की प्रधानता, स्वतंत्र प्रकृति चित्रण, अतीत गौरव गान, हास्य व्यंग आदि प्रवृत्तियाँ इस काल में दिखाई देती है।
          इस  युग के उल्लेखनीय कवि सियारामशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा, मुकुटधर पांडेय, गया प्रसाद शुक्लसनेही’, रामचरित उपाध्याय आदि है।
3. छायावादी युग 1920 से 1936 . 
          आधुनिक कविता का तीसरा युग छायावादी प्रवृत्तियों की प्रधानता के कारण छायावाद युग कहलाता है; तथापि इस युग में छायावादी काव्य के साथ-साथ राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्य, प्रेम और मस्ती का काव्य, हास्य व्यंग्य काव्य का भी निर्माण होता गया। इस युग को स्वच्छंदतावादी- युग के नाम से भी जाना जाता है। सर्वप्रथम मुकुटधर पांडेय ने इन रचनाओं के लिए व्यंग्यात्मक रूप में (कविता न होकर उसकी छाया है) छायावाद शब्द का प्रयोग किया जो कि बाद में इस कविता के लिए रूढ़ हो गया और इस धारा के कवि ने भी इसे अपना लिया।
          छायावादी युग की व्यक्तिवाद की प्रधानता, प्रकृति चित्रण प्रियता, नारी के सौंदर्य और प्रेम का चित्रण, विरह वेदना की अभिव्यक्ति, मानवतावाद, स्वच्छंदतावाद आदि प्रमुख प्रवृत्तियां है।
           जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा,  नरेंद्र शर्मा आदि इस युग के प्रमुख कवि है। इस युग की प्रमुख कविता बीती विभावरी जाग री का समावेश पाठ्यक्रम में किया गया है।

4. प्रगतिवादी युग 1936 से 1943 ई. 
छायावादी काव्य की अतिशय काल्पनिकता, घोर आत्मनिष्ठा, निराशावादी दृष्टिकोण और सौंदर्य लोक में विचरण करने की प्रवृत्ति के प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदी साहित्य में सन 1936 के आसपास जो नई काव्यधारा निर्माण हुई वहप्रगतिवादके नाम से पहचानी जाती है। वास्तव में राजनीतिक क्षेत्र में जो समाजवाद है, दर्शन के क्षेत्र में जो द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है, वही साहित्य के क्षेत्र में प्रगतिवाद हैं। मूलतः यह विचारधारा कार्ल मार्क्स के द्वंद्वात्मक विकासवाद पर आश्रित है। मार्क्स की साम्यवादी विचारधारा का केंद्र बिंदु मजदूर और उसका जीवन है। प्रगतिवादी काव्य में मार्क्स के इस साम्यवादी विचारों की साहित्यिक अभिव्यक्ति हुई है।
 इस  युग में परंपरा और रूढ़ियों का विरोध, शोषकों के प्रति आक्रोश, शोषितों का करुण गान,मार्क्स का गुणगान, क्रांति की भावना, मानवतावाद, वेदना और निराशा, सामाजिक जीवन का यथार्थ चित्रण, सामाजिक समस्याओं का चित्रण आदि प्रवृत्तियाँ दिखाई देती है।
 इस युग में नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, मुक्तिबोध, रांगेय राघव आदि कवि महत्वपूर्ण है।
 इस युग की प्रतिनिधि कविता नागार्जुन जी की प्रेत का बयानका इस पाठ्यक्रम में समावेश किया गया है।

5. प्रयोगवादी युग 1943 से 1954 ई. 
       हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद का आरंभ यद्यपि अज्ञेय द्वारा संपादित प्रथम तार सप्तक (1943 ई.) के प्रकाशन काल से माना जाता है तथापि इसके पूर्व ही निराला केकुकुरमुत्ताऔरनए पत्तेतथा जयनाथ नलिन केधरती के बोलकाव्य संग्रह में प्रयोगवादी प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं। प्रतीक वाद, प्रपदय वाद, रूप वाद और नई कविता प्रयोगवाद के ही विभिन्न नाम है ; किंतु प्रयोगवाद नाम ही इस काल की कविताओं के लिए अधिक प्रचलित और उचित हैं। ये कवि काव्य को प्रयोग का विषय क्षेत्र मानकर ही चलते हैं। इनका कोई निश्चित जीवन दर्शन नहीं है। कविता के प्रति एक अन्वेषिका दृष्टिकोण ही इन्हें समानता के सूत्र में बांधता है। प्रयोगवादी कवियों पर टी.एस.इलियट, डी.एच.लॉरेंस, एजरा पाउंड,सार्त्र, फ्राइड आदि पाश्चात्य विचारकों का विशेष प्रभाव है। इन कवियों ने अपने काव्य में भावुकता के स्थान पर ठोस बौद्धिकता को अपनाया है। जीवन की समस्त जड़ता, कुंठा, अनास्था, पराजय  आदि उनके काव्य के विषय रहते हैं। इनके काव्य में व्यक्तिवादीता,बौद्धिकता, अश्लीलता, क्लिस्ट प्रतीक योजना का समावेश होता है।
           घोर अहंनिष्ट व्यक्तिवाद,अतिबौद्धिकता,अति नग्न यथार्थवाद, क्षण बोध एवं पीड़ा बोध,  उपमानों की नवीनता, प्रतीकों का बाहुल्य आदि विशेषताएं दिखाई देती है।
           प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय,कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह आदि प्रयोगवादी युग के प्रमुख कवि है।
6. नई कविता 1954 से 1960 ई. 
          प्रयोगवादी काव्यधारा धीमी पड़ने के बाद हिंदी काव्य क्षेत्र में जिस नई काव्यधारा का आविर्भाव हुआ वह नई कविता के नाम से पहचानी जाती है। नई कविता अपने आप में ही प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के अतिरिक्त समसामयिक युगबोध और युग धर्म को समेटकर चलती है। नई कविता नामकरण में नए विशेषण आधुनिक कविता में नवोन्मेष का सूचक है। वैसे प्रत्येक युग की कविता अपने युग में नयी होती है। नई कविता का अपना जीवन दर्शन है। नई कविता वर्तमान और भविष्य के साथ अतीत को भी नवीन रूप में प्रस्तुत करती हैं। नए कथ्य एवं नई संवेदना के अनुरूप इन कवियों की भाषा भी नए ढंग की है। 
          नई जीवन दृष्टि का विकास, उपेक्षित कि मानवीय धरातल पर स्वीकृति, अनुभूति की सच्चाई,  क्षणवाद का चित्रण, आधुनिकता का आग्रह, समन्वय की भावना आदि नई कविता की विशेषताएं है। अज्ञेय, मुक्तिबोध, धर्मवीर भारती, नागार्जुन, मुद्राराक्षस, दुष्यंत कुमार, श्याम परमार, शमशेर बहादुर सिंह,भवानी प्रसाद मिश्र आदि नई कविता के कवि है।
7. साठोत्तरी कविता 1960 से अब तक
       सन 1960 ई. के बाद हिंदी काव्य क्षेत्र में कई नई काव्य प्रवृत्तियाँ और आवाजें उभरी है। जिनमें प्रमुख है विद्रोही कविता, बोध कविता, अकविता, भूखी पीढ़ी की कविता, ठोस कविता, सहज कविता, शुद्ध कविता,अतिकविता,अगली कविता, गलत कविता आदि। आज हिंदी कविता की धारा वादमुक्त होकर अनेक दिशाओं में आगे बढ़ रही है। किंतु अभी तक इनमें से कोई भी धारा हिंदी साहित्य क्षेत्र में प्रतिष्ठित नहीं हो सकी है।
           साठोत्तरी कविता में मुख्य रूप से नई कविता के प्रति विद्रोह के स्वर दिखाई देते हैं।  साठोत्तरी कविता में रचना के नाम पर विखंडन और विद्रोह के स्वर ही अधिक है। इस काल के कवियों ने अपनी रचनाओं में आधुनिक जीवन की विसंगति और अर्थहीनता कि साहसपूर्ण अभिव्यक्ति की है। गिरते मानवीय मूल्य,यंत्रणामयी विवशता,भय,अकेलापन, अस्तित्व संकट की अनुभूति, यांत्रिक सभ्यता के खोखलेपन, अतीत और वर्तमान दोनों के प्रति विद्रोह इस कविता में दिखाई देता है। इस कविता में नवीन विषय अनुभूति में आस्था दिखाई देती है। विस्तृत मानवतावाद, अति नग्न  यथार्थवाद, वैयक्तिकता की प्रधानता इस कविता की विशेषताएं हैं। कवि धूमिल, लीलाधर जगूड़ी, नरेश सक्सेना, जगदीश चतुर्वेदी, चंद्रकांत देवताले, राजेश जोशी,मंगलेश डबराल,सुशीला टाकभौरे आदि कवि महत्वपूर्ण है।


संदर्भ

1.धूमिल की श्रेष्ठ कविताएँ- सं. ब्रह्मा देव मिश्र, शिवकुमार मिश्र, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली।
२.काव्य प्रभा- सं. डॉ.शिवाजी निगम, प्रा. जयंत जाधव, मेहता पब्लिशिंग हाउस, पुणे।
३.हिंदी कविता अभी बिल्कुल अभी- नंद किशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
४.साहित्य सुरभि- सं. डॉ.सुरैया शेख. लोकभारती प्रकाशन. नई दिल्ली। 

नीलेश रघुवंशी- बिना टिकट यात्रा करती लड़की


नीलेश रघुवंशी- बिना टिकट यात्रा करती लड़की

नीलेश रघुवंशी वर्तमान कविता की जानी पहचानी कवयित्री है। उनका जन्म मध्य प्रदेश के गंज बासौदा में हुआ।घर निकासी, पानी का स्वाद, अंतिम पंक्ति में उनके  प्रसिद्ध कविता संग्रह है। कविता नाटक तथा टेलीफिल्म में पटकथा लेखन का कार्य वे करती हैं। 
बिना टिकट यात्रा करती लड़कीकविता एक अर्थाभावग्रस्त लड़की की व्यथा का यथार्थ अंकन करने वाली कविता है। वह लड़की यात्रा करते समय सबके साथ होने के बाद भी सबसे अपने आप को बचाती है। वह किसी से भी आँख नहीं मिलाती । वह यात्रा करते समय अपनी घबराहट को छिपाती है। उसे इस बात का डर है कि कहीं मुझे बिना टिकट यात्रा करने के कारण पकड़ न लिया जाए। ऐसा नहीं है कि उसके पास टिकट निकालने के लिए पैसे नहीं है वह उन पैसों को बचाना चाहती है। जेब में हाथ डाल कर मौजूदा पैसों को चुपचाप टटोलती है।जब टिकट चेक करने के लिए टिकट चेकर आता है तो उसकी ओर देख कर मुस्कुराती है जैसे ही टिकट चेकर करीब आता है वह खिड़की से बाहर झांकने लगती है।इस प्रकार वह अपने आपको अपनी घबराहट से बचाना चाहती है।
 वह खिड़की से बाहर देखती है। उसे दिखाई देता है कि प्रकृति के पेड़, पहाड़ और आसमान सभी बिना टिकट यात्रा कर रहे हैं। आसमान में चिड़ियाँ बिना टिकट ही यात्रा करती है तो फिर उसे ही क्यों टिकट निकालना पड़ता है? उसे लगता है कि चिड़ियाँ के समान उसे भी बिना टिकट यात्रा करने का मौका मिल जाए। क्योंकि उसका परिवार अत्यंत गरीब है। उसके पिताजी बीमार हैं। उसकी छोटी बहन पढ़ाई कर रही है। वह चाहती है की टिकट के पच्चीस रुपये बचाकर अपने पिता को फल लेकर जाए। और उसको इस इन पच्चीस रुपयों का मूल्य पता है। इससे अपनी छोटी बहन के लिए कोई किताब खरीदी जा सकती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि वह लड़की जो पैसा बचा रही है वह अपने परिवार के लिए खर्च करना चाहती है। इस प्रकार हमें पता चलता है कि लड़कियाँ हमेशा अपने घरबार की चिंता में लगी रहती है। वह पिता के साथ पति के घर को भी रोशन करती है।
पच्चीस  का टिकट लो
 इस महंगाई और बेरोजगारी के दिनों में
 अखरता है कितना
 इन पच्चीस रुपयों में ले जा सकती है फल पिता के लिए।
लड़की को पता है कि आजकल महँगाई कितनी बढ़ गई है। बेरोजगारी के कारण एक-एक रुपए का मूल्य उसको पता है। उसे इस बात की चिंता है कि एक भी रुपया व्यर्थ ना जाए। वह दुनिया के नियम नहीं जानती। उसे तो इतना ही पता है कि इन रुपयों से उसकी घर की ज़रूरते पूरी की जा सकती है। इन पंक्तियों से पता चलता है कि एक लड़की की समझ आर्थिक परिस्थिति के कारण कितनी बढ़ जाती है। अपने परिवार के लिए खतरे उठाकर भी वह त्याग करती है। लोग क्या कहेंगे इस बात की चिंता न करते हुए वह अपने परिवार के लिए सोचती रहती है।
 बोगी में बैठे लोग आपस में बातें कर रहे हैं। कोई कहता है कि चेहरा देखकर ही पता चलता है कि कौन बिना टिकट यात्रा कर रहा है। उन बातों पर लड़की मन ही मन में हंसती है। उसे लगता है कि जो लोग बातें कर रहे हैं उनको समझ में नहीं आ रहा है कि मैंने कैसे पैसे बचाएँ। लेकिन वह अपनी हंसी छिपाती भी है क्योंकि उसे पकड़े जाने का भय अंदर से सताता है। वह कल्पना से ही सिहर जाती है। क्योंकि उसे पता है अगर पकड़े गए तो कितनी यातनाएँ झेलनी पड़ेगी।
 इस प्रकार हम देखते हैं कि एक लड़की समाज में अक्सर कितना त्याग करती है। और वह एक लड़की ही कर सकती है। कवयित्री नीलेश रघुवंशी इस बात को स्पष्ट करना चाहती है की सच्चे अर्थों में परिवार के लिए त्याग करती हैं।


बिना टिकट यात्रा करती लड़की
होते हुए सबके साथ भी
सबसे बचाती है अपने को
किसी से भी आँखें नहीं मिलाती
बिना टिकट यात्रा करती लड़की।

छिपाती है अपनी घबराहट
जेब में हाथ डाल चुपचाप टटोलती है रुपए
टिकट-चैकर को देख मुस्कुराती है
पास आता है टिकट-चैकर
तो खिड़की के बाहर झाँकने लगती है
बिना टिकट यात्रा करती लड़की।

राहत की साँस लेती है
बिना टिकट यात्रा करती लड़की
पेड़ पहाड़ आसमान भी तो
हैं उसी की तरह बिना टिकट
बिना टिकट ही यात्रा करती हैं चिड़ियाँ सारे आसमान में।
पच्चीस रुपए का टिकट लो
इस महंगाई और बेरोज़गारी के दिनों में
अखरता है कितना
इन पच्चीस रुपयों में ले जा सकती है फल पिता के लिए।
ख़रीद सकती है
एक ज़रूरी क़िताब
अपनी छोटी बहन के लिए।

बोग़ी में बैठे लोग बतियाते हैं--
’चेहरा बता देता है, साहब
कौन चल रहा है बिना टिकट’
मन ही मन हँसती है
और हँसी को छिपाती है
बिना टिकट यात्रा करती लड़की
पकड़े जाने की आशंका से
अन्दर ही अन्दर सिहर जाती है
बिना टिकट यात्रा करती लड़की।