Tuesday, April 7, 2020

नीलेश रघुवंशी- बिना टिकट यात्रा करती लड़की


नीलेश रघुवंशी- बिना टिकट यात्रा करती लड़की

नीलेश रघुवंशी वर्तमान कविता की जानी पहचानी कवयित्री है। उनका जन्म मध्य प्रदेश के गंज बासौदा में हुआ।घर निकासी, पानी का स्वाद, अंतिम पंक्ति में उनके  प्रसिद्ध कविता संग्रह है। कविता नाटक तथा टेलीफिल्म में पटकथा लेखन का कार्य वे करती हैं। 
बिना टिकट यात्रा करती लड़कीकविता एक अर्थाभावग्रस्त लड़की की व्यथा का यथार्थ अंकन करने वाली कविता है। वह लड़की यात्रा करते समय सबके साथ होने के बाद भी सबसे अपने आप को बचाती है। वह किसी से भी आँख नहीं मिलाती । वह यात्रा करते समय अपनी घबराहट को छिपाती है। उसे इस बात का डर है कि कहीं मुझे बिना टिकट यात्रा करने के कारण पकड़ न लिया जाए। ऐसा नहीं है कि उसके पास टिकट निकालने के लिए पैसे नहीं है वह उन पैसों को बचाना चाहती है। जेब में हाथ डाल कर मौजूदा पैसों को चुपचाप टटोलती है।जब टिकट चेक करने के लिए टिकट चेकर आता है तो उसकी ओर देख कर मुस्कुराती है जैसे ही टिकट चेकर करीब आता है वह खिड़की से बाहर झांकने लगती है।इस प्रकार वह अपने आपको अपनी घबराहट से बचाना चाहती है।
 वह खिड़की से बाहर देखती है। उसे दिखाई देता है कि प्रकृति के पेड़, पहाड़ और आसमान सभी बिना टिकट यात्रा कर रहे हैं। आसमान में चिड़ियाँ बिना टिकट ही यात्रा करती है तो फिर उसे ही क्यों टिकट निकालना पड़ता है? उसे लगता है कि चिड़ियाँ के समान उसे भी बिना टिकट यात्रा करने का मौका मिल जाए। क्योंकि उसका परिवार अत्यंत गरीब है। उसके पिताजी बीमार हैं। उसकी छोटी बहन पढ़ाई कर रही है। वह चाहती है की टिकट के पच्चीस रुपये बचाकर अपने पिता को फल लेकर जाए। और उसको इस इन पच्चीस रुपयों का मूल्य पता है। इससे अपनी छोटी बहन के लिए कोई किताब खरीदी जा सकती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि वह लड़की जो पैसा बचा रही है वह अपने परिवार के लिए खर्च करना चाहती है। इस प्रकार हमें पता चलता है कि लड़कियाँ हमेशा अपने घरबार की चिंता में लगी रहती है। वह पिता के साथ पति के घर को भी रोशन करती है।
पच्चीस  का टिकट लो
 इस महंगाई और बेरोजगारी के दिनों में
 अखरता है कितना
 इन पच्चीस रुपयों में ले जा सकती है फल पिता के लिए।
लड़की को पता है कि आजकल महँगाई कितनी बढ़ गई है। बेरोजगारी के कारण एक-एक रुपए का मूल्य उसको पता है। उसे इस बात की चिंता है कि एक भी रुपया व्यर्थ ना जाए। वह दुनिया के नियम नहीं जानती। उसे तो इतना ही पता है कि इन रुपयों से उसकी घर की ज़रूरते पूरी की जा सकती है। इन पंक्तियों से पता चलता है कि एक लड़की की समझ आर्थिक परिस्थिति के कारण कितनी बढ़ जाती है। अपने परिवार के लिए खतरे उठाकर भी वह त्याग करती है। लोग क्या कहेंगे इस बात की चिंता न करते हुए वह अपने परिवार के लिए सोचती रहती है।
 बोगी में बैठे लोग आपस में बातें कर रहे हैं। कोई कहता है कि चेहरा देखकर ही पता चलता है कि कौन बिना टिकट यात्रा कर रहा है। उन बातों पर लड़की मन ही मन में हंसती है। उसे लगता है कि जो लोग बातें कर रहे हैं उनको समझ में नहीं आ रहा है कि मैंने कैसे पैसे बचाएँ। लेकिन वह अपनी हंसी छिपाती भी है क्योंकि उसे पकड़े जाने का भय अंदर से सताता है। वह कल्पना से ही सिहर जाती है। क्योंकि उसे पता है अगर पकड़े गए तो कितनी यातनाएँ झेलनी पड़ेगी।
 इस प्रकार हम देखते हैं कि एक लड़की समाज में अक्सर कितना त्याग करती है। और वह एक लड़की ही कर सकती है। कवयित्री नीलेश रघुवंशी इस बात को स्पष्ट करना चाहती है की सच्चे अर्थों में परिवार के लिए त्याग करती हैं।


बिना टिकट यात्रा करती लड़की
होते हुए सबके साथ भी
सबसे बचाती है अपने को
किसी से भी आँखें नहीं मिलाती
बिना टिकट यात्रा करती लड़की।

छिपाती है अपनी घबराहट
जेब में हाथ डाल चुपचाप टटोलती है रुपए
टिकट-चैकर को देख मुस्कुराती है
पास आता है टिकट-चैकर
तो खिड़की के बाहर झाँकने लगती है
बिना टिकट यात्रा करती लड़की।

राहत की साँस लेती है
बिना टिकट यात्रा करती लड़की
पेड़ पहाड़ आसमान भी तो
हैं उसी की तरह बिना टिकट
बिना टिकट ही यात्रा करती हैं चिड़ियाँ सारे आसमान में।
पच्चीस रुपए का टिकट लो
इस महंगाई और बेरोज़गारी के दिनों में
अखरता है कितना
इन पच्चीस रुपयों में ले जा सकती है फल पिता के लिए।
ख़रीद सकती है
एक ज़रूरी क़िताब
अपनी छोटी बहन के लिए।

बोग़ी में बैठे लोग बतियाते हैं--
’चेहरा बता देता है, साहब
कौन चल रहा है बिना टिकट’
मन ही मन हँसती है
और हँसी को छिपाती है
बिना टिकट यात्रा करती लड़की
पकड़े जाने की आशंका से
अन्दर ही अन्दर सिहर जाती है
बिना टिकट यात्रा करती लड़की।





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