अभी न होगा मेरा अन्त
'अभी न होगा मेरा अन्त' कविता में कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' ने जीवन के प्रति आशा-उल्लास का स्वर व्यक्त किया है।
जीवन में युवावस्था आने पर हृदय में मादकता और उल्लास का संचार उसी प्रकार होने लगता है जैसे बसन्त ऋतु आने पर समस्त प्रकृति में नवीनता छा जाती है, पेड़-पौधों पर नए पत्ते-पुष्प आने लग जाते है और सारा परिवेश सुरम्य बन जाता है।
अतः कवि कहता है कि जीवन में युवावस्था रूपी बसन्त के आगमन से हृदयगत उल्लास उत्साह निरन्तर बढ़ रहा है, जीने की प्रबल लालसा बढ़ रही है और इसमें गतिशीलता भी बढ़ रही है।
जब जीवन में ठहराव जरा भी नहीं है, तो इसका अन्त भी अभी नहीं हो पायेगा। वैसे भी जीवन में अभी-अभी युवावस्था का आगमन हुआ है, तो इसे भोगने तथा कुछ कर दिखाने का अवसर मिला है।
इसलिए हाथ-पर-हाथ रखकर बैठने के बजाय कुछ कर्म-सौन्दर्य बढ़ाने का मौका मिला है। यह जीवन कुछ नया करने और आगे बढ़ने के लिए है। इसमें निराशा न रखकर आशा और उत्साह रखना जरूरी है।
इस प्रकार प्रस्तुत कविता का मूल भाव - जीवन के प्रति आशावादी बनने, कर्मों को अच्छे करने में प्रवृत्त होने तथा प्रखर जिजीविषा रखने से युक्त है।

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