Tuesday, April 7, 2020

आधुनिक हिंदी कविता



आधुनिक हिंदी कविता


आधुनिक शब्द अंग्रेजी के मॉडर्न (modern) शब्द का हिंदी पर्याय है। यह शब्द दो अर्थों को सूचित करता है- मध्यकाल से भिन्नता और नवीन इहलौकिक दृष्टिकोण की सूचना। अगर हम पहले अर्थ की दृष्टि से देखें तो आधुनिक काल में साहित्य मध्यकाल एवं रीतिकाल के बंधे हुए घाटों से मुक्त होकर मनुष्य के वृहत्तर सुख दुख के साथ पहली बार जुड़ जाता है। और मॉडर्न इस दूसरे अर्थ के अनुसार आधुनिक काल में धर्म,दर्शन,साहित्य आदि सभी के प्रति नए दृष्टिकोण का आविर्भाव हुआ। इस युग में मनुष्य अपनी अलग अलग समस्याओं के प्रति सजग हुआ। आधुनिक शब्द मनुष्य के सोचने विचार करने के स्तर से संबंधित है। आधुनिक शब्द को संकुचित अर्थ मेंसमसामयिकभी पहचानते हैं। समसामयिकशब्द की दृष्टि से देखा जाए तो आधुनिक का अर्थ है जो वर्तमान में जीता है, वर्तमान को भोगता है और परंपरा का विरोध भी करता है। इस अर्थ में आधुनिक व्यक्ति कुछ खास नारों, वादों और स्थितियों के प्रति पक्षपातपूर्ण रुख अपनाता है।
          आधुनिक हिंदी कविता का आरंभ भारतेंदु काल से माना जाता है। भारतेंदु काल से साठोत्तरी कविता तक हिंदी कविता में अलग-अलग धाराएँ प्रवाहित हुई। हिंदी कविता का रूप बदलना उस काल की परिस्थितियों की प्रतिक्रिया थी। भारतेंदु कालीन कविता में देश प्रेम,राष्ट्रवाद की जो झलक दिखाई देती है उसके लिए उस समय की सामाजिक,राजनीतिक परिस्थिति कारण थी। स्वातंत्र्योत्तर काल में देश की नवचेतना नवनिर्माण में संलग्न हुई। परिणाम स्वरूप हिंदी काव्य में भी परिवर्तन आता गया। इस काल में देश की राजनीतिक,सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों में विशेष परिवर्तन हुए। जिसका असर साहित्य पर भी पड़ा। परिणाम स्वरूप  इस काल का साहित्य विषय और शैली दोनों दृष्टियों से अपने पूर्ववर्ती साहित्य से भिन्न हो गया। साधारणत: आधुनिक हिंदी कविता का काल विभाजन करते समय निम्नलिखित भेद किए जाते हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए इन्हें निम्नलिखित सोपानों में विभाजित किया जा सकता है-
         
1. भारतेंदु युग -1950 से 1900 ई.
          2. द्विवेदी युग- 1900 से 1920 ई.
          3. छायावादी युग 1920 से 1936 ई. 
4. प्रगतिवादी युग 1936 से 1943 ई. 
5. प्रयोगवादी युग 1943 से 1954 ई. 
6. नई कविता 1954 से 1960 ई. 
7. साठोत्तरी कविता 1960 से अब तक
1. भारतेंदु युग -1950 से 1900 ई.
       आधुनिक हिंदी कविता का सूत्रपात भारतेंदु युग से होता है। अतः भारतेंदु युग आधुनिक हिंदी कविता का प्रवेश द्वार माना जाता है। इस युग में जहाँ एक और प्राचीन हिंदी कविता की परंपराओं का निर्वाह किया गया वहाँ दूसरी ओर जनसामान्य को केंद्र बनाकर कविता के क्षेत्र में कुछ नए विषयों का ग्रहण भी हुआ। इस युग के कवि समाज सुधारक, पत्रकार और प्रचारक अधिक थे। इसलिए इनकी कविताओं में समाज सुधार, देश भक्ति, नवजागरण, हास्य-व्यंग्यात्मकता, इतिवृत्त्तात्मकता आदि  प्रवृत्तियां दिखाई देती है। 
           इस युग के प्रमुख कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र, बद्रीनारायण चौधरीप्रेमघन’, पंडित अंबिका दत्त व्यास, जगन्नाथदासरत्नाकर’, वियोगी हरि आदि है।
2. द्विवेदी युग- 1900 से 1920 ई.
       द्विवेदी युग राष्ट्रीय आंदोलन तथा नवजागरण का युग रहा है। अतः इस युग कोजागरण-सुधार-कालयासुधारवादी युगके नाम से भी अभिहित किया जाता है। भारतेंदु काल में जिस राष्ट्रीयता और समाज सुधार की भावना का सूत्रपात हुआ था द्विवेदी युग में उसका विकास हुआ। उस काल की कविताओं में स्वतंत्रता प्रेम जनमानस में निर्माण करने का कार्य किया। राष्ट्रीयता की भावना,समाज सुधार,आध्यात्मिकता और मानवता,बौद्धिकता की प्रधानता, स्वतंत्र प्रकृति चित्रण, अतीत गौरव गान, हास्य व्यंग आदि प्रवृत्तियाँ इस काल में दिखाई देती है।
          इस  युग के उल्लेखनीय कवि सियारामशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा, मुकुटधर पांडेय, गया प्रसाद शुक्लसनेही’, रामचरित उपाध्याय आदि है।
3. छायावादी युग 1920 से 1936 . 
          आधुनिक कविता का तीसरा युग छायावादी प्रवृत्तियों की प्रधानता के कारण छायावाद युग कहलाता है; तथापि इस युग में छायावादी काव्य के साथ-साथ राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्य, प्रेम और मस्ती का काव्य, हास्य व्यंग्य काव्य का भी निर्माण होता गया। इस युग को स्वच्छंदतावादी- युग के नाम से भी जाना जाता है। सर्वप्रथम मुकुटधर पांडेय ने इन रचनाओं के लिए व्यंग्यात्मक रूप में (कविता न होकर उसकी छाया है) छायावाद शब्द का प्रयोग किया जो कि बाद में इस कविता के लिए रूढ़ हो गया और इस धारा के कवि ने भी इसे अपना लिया।
          छायावादी युग की व्यक्तिवाद की प्रधानता, प्रकृति चित्रण प्रियता, नारी के सौंदर्य और प्रेम का चित्रण, विरह वेदना की अभिव्यक्ति, मानवतावाद, स्वच्छंदतावाद आदि प्रमुख प्रवृत्तियां है।
           जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा,  नरेंद्र शर्मा आदि इस युग के प्रमुख कवि है। इस युग की प्रमुख कविता बीती विभावरी जाग री का समावेश पाठ्यक्रम में किया गया है।

4. प्रगतिवादी युग 1936 से 1943 ई. 
छायावादी काव्य की अतिशय काल्पनिकता, घोर आत्मनिष्ठा, निराशावादी दृष्टिकोण और सौंदर्य लोक में विचरण करने की प्रवृत्ति के प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदी साहित्य में सन 1936 के आसपास जो नई काव्यधारा निर्माण हुई वहप्रगतिवादके नाम से पहचानी जाती है। वास्तव में राजनीतिक क्षेत्र में जो समाजवाद है, दर्शन के क्षेत्र में जो द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है, वही साहित्य के क्षेत्र में प्रगतिवाद हैं। मूलतः यह विचारधारा कार्ल मार्क्स के द्वंद्वात्मक विकासवाद पर आश्रित है। मार्क्स की साम्यवादी विचारधारा का केंद्र बिंदु मजदूर और उसका जीवन है। प्रगतिवादी काव्य में मार्क्स के इस साम्यवादी विचारों की साहित्यिक अभिव्यक्ति हुई है।
 इस  युग में परंपरा और रूढ़ियों का विरोध, शोषकों के प्रति आक्रोश, शोषितों का करुण गान,मार्क्स का गुणगान, क्रांति की भावना, मानवतावाद, वेदना और निराशा, सामाजिक जीवन का यथार्थ चित्रण, सामाजिक समस्याओं का चित्रण आदि प्रवृत्तियाँ दिखाई देती है।
 इस युग में नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, मुक्तिबोध, रांगेय राघव आदि कवि महत्वपूर्ण है।
 इस युग की प्रतिनिधि कविता नागार्जुन जी की प्रेत का बयानका इस पाठ्यक्रम में समावेश किया गया है।

5. प्रयोगवादी युग 1943 से 1954 ई. 
       हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद का आरंभ यद्यपि अज्ञेय द्वारा संपादित प्रथम तार सप्तक (1943 ई.) के प्रकाशन काल से माना जाता है तथापि इसके पूर्व ही निराला केकुकुरमुत्ताऔरनए पत्तेतथा जयनाथ नलिन केधरती के बोलकाव्य संग्रह में प्रयोगवादी प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं। प्रतीक वाद, प्रपदय वाद, रूप वाद और नई कविता प्रयोगवाद के ही विभिन्न नाम है ; किंतु प्रयोगवाद नाम ही इस काल की कविताओं के लिए अधिक प्रचलित और उचित हैं। ये कवि काव्य को प्रयोग का विषय क्षेत्र मानकर ही चलते हैं। इनका कोई निश्चित जीवन दर्शन नहीं है। कविता के प्रति एक अन्वेषिका दृष्टिकोण ही इन्हें समानता के सूत्र में बांधता है। प्रयोगवादी कवियों पर टी.एस.इलियट, डी.एच.लॉरेंस, एजरा पाउंड,सार्त्र, फ्राइड आदि पाश्चात्य विचारकों का विशेष प्रभाव है। इन कवियों ने अपने काव्य में भावुकता के स्थान पर ठोस बौद्धिकता को अपनाया है। जीवन की समस्त जड़ता, कुंठा, अनास्था, पराजय  आदि उनके काव्य के विषय रहते हैं। इनके काव्य में व्यक्तिवादीता,बौद्धिकता, अश्लीलता, क्लिस्ट प्रतीक योजना का समावेश होता है।
           घोर अहंनिष्ट व्यक्तिवाद,अतिबौद्धिकता,अति नग्न यथार्थवाद, क्षण बोध एवं पीड़ा बोध,  उपमानों की नवीनता, प्रतीकों का बाहुल्य आदि विशेषताएं दिखाई देती है।
           प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय,कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह आदि प्रयोगवादी युग के प्रमुख कवि है।
6. नई कविता 1954 से 1960 ई. 
          प्रयोगवादी काव्यधारा धीमी पड़ने के बाद हिंदी काव्य क्षेत्र में जिस नई काव्यधारा का आविर्भाव हुआ वह नई कविता के नाम से पहचानी जाती है। नई कविता अपने आप में ही प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के अतिरिक्त समसामयिक युगबोध और युग धर्म को समेटकर चलती है। नई कविता नामकरण में नए विशेषण आधुनिक कविता में नवोन्मेष का सूचक है। वैसे प्रत्येक युग की कविता अपने युग में नयी होती है। नई कविता का अपना जीवन दर्शन है। नई कविता वर्तमान और भविष्य के साथ अतीत को भी नवीन रूप में प्रस्तुत करती हैं। नए कथ्य एवं नई संवेदना के अनुरूप इन कवियों की भाषा भी नए ढंग की है। 
          नई जीवन दृष्टि का विकास, उपेक्षित कि मानवीय धरातल पर स्वीकृति, अनुभूति की सच्चाई,  क्षणवाद का चित्रण, आधुनिकता का आग्रह, समन्वय की भावना आदि नई कविता की विशेषताएं है। अज्ञेय, मुक्तिबोध, धर्मवीर भारती, नागार्जुन, मुद्राराक्षस, दुष्यंत कुमार, श्याम परमार, शमशेर बहादुर सिंह,भवानी प्रसाद मिश्र आदि नई कविता के कवि है।
7. साठोत्तरी कविता 1960 से अब तक
       सन 1960 ई. के बाद हिंदी काव्य क्षेत्र में कई नई काव्य प्रवृत्तियाँ और आवाजें उभरी है। जिनमें प्रमुख है विद्रोही कविता, बोध कविता, अकविता, भूखी पीढ़ी की कविता, ठोस कविता, सहज कविता, शुद्ध कविता,अतिकविता,अगली कविता, गलत कविता आदि। आज हिंदी कविता की धारा वादमुक्त होकर अनेक दिशाओं में आगे बढ़ रही है। किंतु अभी तक इनमें से कोई भी धारा हिंदी साहित्य क्षेत्र में प्रतिष्ठित नहीं हो सकी है।
           साठोत्तरी कविता में मुख्य रूप से नई कविता के प्रति विद्रोह के स्वर दिखाई देते हैं।  साठोत्तरी कविता में रचना के नाम पर विखंडन और विद्रोह के स्वर ही अधिक है। इस काल के कवियों ने अपनी रचनाओं में आधुनिक जीवन की विसंगति और अर्थहीनता कि साहसपूर्ण अभिव्यक्ति की है। गिरते मानवीय मूल्य,यंत्रणामयी विवशता,भय,अकेलापन, अस्तित्व संकट की अनुभूति, यांत्रिक सभ्यता के खोखलेपन, अतीत और वर्तमान दोनों के प्रति विद्रोह इस कविता में दिखाई देता है। इस कविता में नवीन विषय अनुभूति में आस्था दिखाई देती है। विस्तृत मानवतावाद, अति नग्न  यथार्थवाद, वैयक्तिकता की प्रधानता इस कविता की विशेषताएं हैं। कवि धूमिल, लीलाधर जगूड़ी, नरेश सक्सेना, जगदीश चतुर्वेदी, चंद्रकांत देवताले, राजेश जोशी,मंगलेश डबराल,सुशीला टाकभौरे आदि कवि महत्वपूर्ण है।


संदर्भ

1.धूमिल की श्रेष्ठ कविताएँ- सं. ब्रह्मा देव मिश्र, शिवकुमार मिश्र, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली।
२.काव्य प्रभा- सं. डॉ.शिवाजी निगम, प्रा. जयंत जाधव, मेहता पब्लिशिंग हाउस, पुणे।
३.हिंदी कविता अभी बिल्कुल अभी- नंद किशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
४.साहित्य सुरभि- सं. डॉ.सुरैया शेख. लोकभारती प्रकाशन. नई दिल्ली। 

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home