Friday, April 17, 2020

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’-भिक्षुक

2) भिक्षुक- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
कवि परिचय
सूर्यकांत त्रिपाठी जी का जन्म बंगाल के महिषादल नामक रियासत ( राज्य) के मेदिनीपुर में सन 21 फरवरी 1896 रविवार के दिन हुआ था जो बसंत पंचमी का दिन था। इनके पिता पंडित राम सहाय त्रिपाठी थे। ‘निराला’ यह सूर्यकांत त्रिपाठी जी का उपनाम है। इसी नाम से प्रसिद्ध रहे। निराला जी की आरंभिक शिक्षा बँगला में ही हुई। संस्कृत,बँगला,अंग्रेजी,हिंदी आदि भाषाओं का ज्ञान निरंतर अध्ययन से अवगत किया।निराला जी की दर्शन और संगीत में रुचि थी। 14 वर्ष की आयु में इनका विवाह मनोहरादेवी से हुआ। इन्हें एक पुत्री थी जिसका नाम सरोज रहा। प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात फैली महामारी में पत्नी तथा परिवार के अन्य सदस्यों की मृत्यु हुई थी। अर्थाभाव के कारण उनका संपूर्ण जीवन बहुत ही एकाकी और संघर्षपूर्ण रहा। सबसे अधिक दुख उन्हें उनकी पुत्री सरोज की मृत्यु से हुआ। निराला जी ने अपने जीवन में सिद्धांतों का त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया।  निराला जी छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। अपनी रचनाओं में उन्होंने यथार्थ को अधिक महत्व दिया। निरालाजी मुक्त छंद के प्रवर्तक रहे हैं। इनकी मृत्यु इलाहाबाद में 15 अक्टूबर 1961 में हुई। निराला जी की काव्य रचनाएं अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अनिमा, बेला, नए पत्ते, आराधना, वर्षा गीत, आदि रहे हैं। वह समन्वय तथा मतवाला के संपादक भी थे। आपने साहित्य गगन में अनेक कविता के सिवा उपन्यास, कहानी, रेखाचित्र आदि विधाओं में भी लेखन  कार्य किया है। एक आलोचक भी थे। निराला की चतुरी चमार कहानी बिलेश्वर बकहीरा रेखाचित्र तथा अप्सरा, निरुपमा, काले कारनामे, चोटी की पकड़ आदि उपन्यास चर्चित रहे।


प्रश्न:-  सूर्यकांत त्रिपाठी’ निराला’ की ‘भिक्षुक’ कविता में भिक्षुक का चित्रण किस प्रकार हुआ है?
उत्तर:- भिक्षुक कविता में निराला जी ने भिखारी की दीनता का बड़ा मार्मिक तथा हृदय स्पर्शी चित्रण किया है। जो यथार्थवादी रहा है। इस कविता में भिखारी की करुण दशा, सहजता, स्वाभाविकता का तथा वास्तविकता का चित्रण किया है। भिक्षुक निराला की प्रगतिवादी श्रेष्ठ कविता रही है जो पाठकों को चिंतन करने एवं सोचने के लिए प्रेरित करती है।
भिक्षुक निराला की प्रगतिवादी कविता है। निराला मूलतः छायावादी कवि थे लेकिन इस कविता से उन्होंने प्रगतिवादी कविता लिखना आरंभ किया। रास्ते पर भटकते एक भिखारी को भीख मांगते हुए जब वे देखते हैं तो उनके मन में उस भिखारी  के प्रति संवेदना पैदा होती है और वह उसकी दशा का वर्णन करने लगते हैं। एक भिखारी को जब भी भीख मांगते देखते हैं तो उनकी दीन-हीन दशा देखकर उनके कलेजे के टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं। वह अपनी दीन-हीन अवस्था को देखकर पश्चाताप करने लगता है। वह लाठी के सहारे धीरे-धीरे चलता है। उसकी पीठ और पेट एक हो गए हैं यानी कि वह कई दिनों से भूखा है। थोड़े से भोजन के लिए उसे दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है। उसके हाथ में एक फटी पुरानी झोली है। जिसे वह सबके सामने फैलाते हुआ भीख मांग रहा है ताकि वह अपना पेट भर सके। यह देखकर कवि का हृदय चीर-चीर हो जाता है। वह दरिद्रता को देखकर पछताता रहता है। 
सड़क पर चलते भिखारी के साथ उसके दो बच्चे भी हैं। वे बाएँ हाथ से अपने पेट को मलते हुए चल रहे हैं और दाहिने हाथ से आते जाते हुए लोगों से कुछ पाने के लिए हाथ फैलाए मांग रहे हैं। भूख से होंठ सूख गए हैं तो वे अपने ही आंसुओं को पी कर रह जाते हैं। ऐसा लगता है मानो उन बच्चों की दशा को देखकर किसी को दया नहीं आती है और किसी से उनको खाने के लिए कुछ भी नहीं मिलता। अतः कवि उनकी दशा को देखकर द्रवित हो जाता है।
भूख से व्याकुल भिखारी और उसके दोनों बच्चे जब मार्ग से गुजरते हैं तो सड़क किनारे जूठी  पत्तल को देखकर उनके उनसे रहा नहीं जाता। और वे अपनी भूख को मिटाने के लिए वह सड़क पर पड़े हुए उन्हें जूठी पत्तलों को चाटते हैं। वह भी गली के कुत्तों के साथ जूठी पत्तलों को  चाटने के लिए लड़ने लगते हैं। कवि यह देखकर दुखी हो जाता है। कवि का हृदय इस बात के लिए चिंतित हो जाता है कि वह उनके दुख दर्द को बांटेगा और उनका दर्द दूर करेगा। 
कवि इस कविता में भिखारी के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करता है।


भिक्षुक
वह आता-
 दो टूक कलेजे के करता पछताता
 पथ पर आता।
 पेट पीठ दोनों मिलकर है एक
 चल रहा  लकुटिया टेक,
 मुट्ठी भर दाने को- भूख मिटाने को
 मुंह फटी पुरानी झोली को फैलाता-
 दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। 
 सात दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,
बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,
 और दाहिना दया दृष्टि पाने की ओर बढ़ाएं। 
 भूख से सुख  होंठ जब जाते
 दाता भाग्य विधाता से क्या पाते?
   घूंट आंसुओं के पीकर रह जाते। 
 चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए
 और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी है अड़े हुए! 

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