मैथिलीशरण गुप्त-शिक्षा की अवस्था
शिक्षा की अवस्था-मैथिलीशरण गुप्त
कवि परिचय-
मैथिली शरण गुप्त का जन्म 1886 में उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के चिरगांव में हुआ। गुप्त जी का परिवार प्रतिष्ठित वैष्णव परिवार रहा है। इनके पिता का नाम राम चरण था जिन्हें ‘कनकलता’ नाम से भी पहचाना जाता था। जो एक कवि थे। गुप्तजी बचपन से ही कविता करते थे। गुप्त जी का मन पाठशाला में नहीं लगता था। अतः इन्होंने घर पर ही बंगाली, मराठी, संस्कृत आदि भाषाओं का सम्यक ज्ञान प्राप्त किया। महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रेरणा एवं प्रोत्साहन से इनकी लेखनी प्रबल हुई तथा काव्य सृजन होता रहा। गुप्त जी में राष्ट्रीय चेतना भरी थी जिससे उन्हें राष्ट्र कवि कहा गया।आगरा विश्वविद्यालय ने आपको साहित्य सेवाओं पर डि.लीट. मानद उपाधि प्रदान की। राष्ट्रकवि यह उपाधि आपको महात्मा गांधी से मिली थी। सन 1954 में भारत सरकार ने आप को ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया था। आप स्वतंत्र भारत की राज्यसभा के दो बार मनोनीत सदस्य भी रहे थे। आप का देहावसान 12 सितंबर 1964 में हुआ। गुप्त जी ने द्विवेदी युग से लिखना शुरू किया था। आपकी ख्याति के मुख्य आधार साकेत, द्वापर, जयभारत, विष्णुप्रिया, भारत भारती, जयद्रथ वध, यशोधरा, पंचवटी, नहुष, विपथगा, रंग में भंग आदि है। जिनका हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान है।
शिक्षा की अवस्था कविता के माध्यम से गुप्त जी ने हमें सजग किया है। वर्तमान में शिक्षा या ज्ञान प्राप्त करने के मार्ग बहुत ही क्लिष्ट बन चुके हैं। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े बड़े-बड़े लोगों का ध्यान विशिष्ट है जिसमें शिक्षा दूरस्थ है। वह कहते हैं कि पूर्वजों के सद्गुणों को ध्यान में रखकर चिंतन करें। पूर्वजों के सद्गुणों से जो परास्त होंगे उन्हें मानव जाति में रहने का अधिकार नहीं है। गुप्त जी नींद से जागने का आलस्य को त्यागने का सजग रहने का इशारा देते हैं वरना सर्वस्व नष्ट होने के भय को भी दर्शाते हैं। अंत में कहते हैं कि कोई भी कार्य एकता से होता है जैसे शून्य के योग से ही एक अंक का दस बन जाता है।
प्रस्तुत कविता में कवि ने आज-कल की उच्च शिक्षा-व्यवस्था पर चिंता प्रकट की है। कवि का कहना है कि आज शिक्षा का मार्ग संकीर्ण हो गया है। उच्च शिक्षा लेने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है है। विश्वविद्यालयों के कुलपति और विश्वविद्यालयों का ध्यान भी शिक्षा क्षेत्र से हट कर अन्य बातों में लगा हुआ है। आज वही उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकता है जिसके पास धन है। गरीब या सामान्य परिवार के छात्र उच्च शिक्षा से दूर रहे हैं। जो अमीर है वही अच्छे महाविद्यालय में प्रवेश प्राप्त कर सकते हैं जिनके पास शुल्क मतलब फ़ीस देने के लिए पैसा नहीं है उनको अनपढ़ ही रहना होगा। कवि कहते हैं पूर्वजों के सद्गुणों को याद करते हुए स्वार्थी वृद्धि का त्याग कर अपने आप पर चिंतन करना चाहिए। जिनको अपने पूर्वजों पर गर्व नहीं वह समाज मृत समाज जैसा हो जाता है और मृत समाज किसी काम का नहीं होता। देश की उन्नति के लिए जागृत समाज की आवश्यकता होती है। सदियों से अन्याय सहन करने वाले समाज को कवि जागृत करने का प्रयास करते हुए कहता है अब तक तुम बहुत सोए अगर आज भी नहीं जागोगे तो तुम्हारा कभी भी भला नहीं होगा। आलसी वृत्ति का त्याग करके अपनी दशा का अवलोकन करो। तुमने अपना सब कुछ खो दिया है। अगर इस हालात से उबरना है तो जागना होगा। जागृत व्यक्ति समाज में उलटफेर कभी भी ला सकता है।
कवि के अनुसार समाज को अपना उद्धार करने के लिए जागृत होना जरूरी है और उसके लिए एकता की आवश्यकता है। एकता में शक्ति होती है और वह शक्ति बहुत कुछ उलटफेर कर सकती है। एक एक मिलकर ग्यारह हो जाते हैं। शून्य मिलाकर भी अंकों का मूल्य दस गुना बढ़ जाता है।
कवि मैथिलीशरण गुप्त जी राष्ट्र प्रेमी कवि रहे हैं। देश की शिक्षा व्यवस्था की सोचनीय हालत उनसे देखे नहीं जाती। जिस देश की शिक्षा व्यवस्था अमीरों तक सीमित है उस देश का विकास असंभव है। शिक्षा निचले तबके तक आनी चाहिए। सरकार को इसका ध्यान रखना जरूरी होता है कि कोई भी प्रतिभावान केवल गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित ना रहे। अगर सरकार सोई है तो समाज को जागना जरूरी है। तभी सरकार की बुद्धि ठिकाने पर आ जाएगी। कवि हक के लिए लड़ने की आवश्यकता प्रतिपादित करता है और इसके लिए एकता का महत्व स्पष्ट करता है। एक होने से हक मिलता है। अकेले-अकेले की आवाज़ किसी के कान पर नहीं पड़ती इसलिए समूह को साथ साथ खड़ा होना जरूर है जरूरी है। एकी से सब कुछ हो जाता है।
शिक्षा की अवस्था
हाँ! आज शिक्षा मार्ग भी संकीर्ण होकर क्लिष्ट है,
कुलपति- सहित उन गुरुकुलों का ध्यान भी अवशिष्ट है।
बिकने लगी विद्या यहां अब, शक्ति हो तो क्रय करो,
यदि शुल्क आदि ना दे सको तो मूर्ख बनकर ही मरो।
निज पूर्वजों उनके सद्गुणों को यत्न से मन में धरो,
सब आत्म- परीभव -भाव तज निज रूप का चिंतन करो।
निज पूर्वजों के सद्गुणों का गर्व जोर रखती नहीं,
वह जाती जीवित जातियों में रह नहीं सकती कहीं।
हे भाइयों सोए बहुत अब तो उठो, जागो अहो!
देखो जरा अपनी दशा, आलस्य को त्यागो अहो!
कुछ पार है, क्या-क्या समय उलट-फेर ना हो चुके!
अब भी सजग होगे न क्या? सर्वस्व तो बुक हो चुके!
हाय कार्य ऐसा कौन-सा साधे न जिसको एकता?
देती नहीं अद्भुत अलौकिक शक्ति किसको एकता?
दो एक एकादश हुए, कितने नहीं देखे सुने?
हां, शून्य के भी योग से है अंक होते दस गुने !
बी.ए. भाग- 2 विषय -हिंदी ‘काव्या लोक’ सत्र -4 पेपर- 6


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