चंद्रकांत देवताले- प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता बेटी के लिए
चंद्रकांत देवताले नई कविता के महत्वपूर्ण कवि
है। समकालीन हिंदी कविता में चंद्रकांत देवताले महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं।
उनका जन्म मध्य प्रदेश में हुआ। उनका परिवार मराठी था। इसलिए वह मराठी अच्छी बोल
लेते हैं। हिंदी की साठोत्तरी कविता के शीर्षक कवि के नाते डॉक्टर चंद्रकांत
देवताले प्रसिद्ध है। राजनीति की बात हो या आर्थिक वैषम्य की, स्त्री पुरुष संबंधों की हो या
अंतर्राष्ट्रीय गिरते जा रहे मानवीय मूल्यों की हो, चंद्रकांत
देवताले जी की कविता अपने बेलौस रवैया के साथ हाजिर है। उनके लकड़बग्घा हंस रहा है, दीवारों पर खून से, हड्डियों की ज्वर प्रसिद्ध काव्य संग्रह है। भूखंड रहा है कविता में
फ्लैशबैक पद्धति के सहारे देश के वर्तमान का यथार्थ एक्सरे किया है। इसमें वर्तमान
से अतीत तथा अतीत से वर्तमान में आता है लेकिन केंद्रीय भाव वर्तमान ही है देश का
वर्तमान अन्याय, अत्याचार, शोषण,
दमन, सत्ता षड्यंत्र, व्यवस्था,
धूर्तता और पूंजीवादी स्वार्थों से ग्रसित है इसका वर्णन कवि करता
है।
चंद्रकांत देवताले नारी
स्वतंत्र के वकील है। देश में नारी को सदैव शोषित रहना पड़ा। वह शोषण से मुक्ति
चाहती हैं। कभी इस बात को अपनी कविता से ही स्पष्ट करते हैं।
‘प्रेम पिता का दिखा ही नहीं देता बेटी के
लिए’ कविता में कवि ने पिता और बेटी के बीच के स्नेह पूर्ण रिश्ते का जिक्र
किया है। बेटी के दूर चले जाने पर पिता को उसकी याद आती है। और उन्हें ऐसे लगता है
इस अकेलेपन की रात में अपनी बेटी की आंखों के तारों के समान चमकती है। मतलब कवि को
अकेले में बेटी की याद आती है। कभी कहते हैं कि बेटी के लिए पिता का प्रेम दिखाई
नहीं देता क्योंकि वह ईथर के समान होता है। जिस प्रकार ईथर ऐसा द्रव है जिसे महसूस
तो किया जाता है लेकिन आंखों को दिखाई नहीं देता। पिता ने दी हुई नसीहतें, सूचनाएं दिखाई देती है। नुकीले पत्थर के समान यह सूचनाएं नसीहतें पीड़ा
देती है लेकिन उन सूचनाओं के बीच जो उद्देश होता है वह बेटी को दिखाई नहीं देता
इसलिए कभी कभी कभी बिटिया नाराज होती है।
प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर
की तरह होता है
जरूर
दिखाई देती होंगी नसीहतें
नुकीले
पत्थरों-सी
कवि कहते हैं दुनियाभर के पिताओ की लंबी कतार
में मुझे ही पता नहीं कि मेरा नंबर कौन सा है लेकिन कवि के लिए उनकी बेटी पहले
नंबर पर है। कवि स्पष्ट करना चाहते हैं कि किसी भी पिता के लिए अपनी बेटी पहले
नंबर पर होती है लेकिन बेटी के लिए पिता नहीं।
कवि को आज इस बात का दुख है
कि उसे लगता था कि बेटी पिता के छाया में ही सुरक्षित रह सकती है लेकिन आज कवि को यह बात मूर्खतापूर्ण लगती है। क्योंकि कवि देख रहा है कि आज इस रंग बिरंगी दुनिया में कवि की
बेटी लगातार आगे बढ़ रही है और अपने कार्य पर खुश है। कवि को इस बात की खुशी है कि
आज कवि की बेटी को कवि के आश्रय की जरूरत नहीं ।इस विशाल दुनिया में बेटी का अपने
पैरों पर खड़े होना कवि को अच्छा लगता है।
पिता ने बेटी के लिए उठाए
हुए कष्ट दिखाई नहीं देते। यह प्रेम कवि को महत्वपूर्ण लगता है इसलिए कभी कहते हैं
प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता बेटी के लिए। प्रस्तुत कविता में कवि चंद्रकांत
देवताले बेटी और पिता के रिश्ते को व्यक्त करते हैं ।
प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
चंद्रकांत देवताले
चंद्रकांत देवताले
तुम्हारी निश्चल आँखें
तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में
प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है जरूर दिखाई देती होंगी नसीहतें नुकीले पत्थरों-सी
दुनिया-भर के पिताओं की लंबी कतार में
पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नंबर है मेरा पर बच्चों के फूलोंवाले बगीचे की दुनिया में तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए
मुझे माफ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो मैं खुश हूँ सोचकर कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाईं |


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