जहीर कुरेशी- ग़ज़ल
जहीर कुरेशी- ग़ज़ल
जहीर कुरैशी समकालीन हिंदी कविता के
सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लकार है। उन्होंने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से मानव जीवन की
अनेकानेक समस्याओं पर प्रकाश डाला है। जीवन के विविध आयाम आपकी ग़ज़लों में
परिलक्षित होते हैं। अब तक आपके दस ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके
हैं।
प्रस्तुत ग़ज़ल के अंतर्गत
ग़ज़लकार जहीर कुरैशी ने नारी अस्मिता के प्रश्न को उठाया है। नारी पर होने वाले
अन्याय अत्याचार, उनका दिन प्रतिदिन होने वाला शोषण, शोषण से मुक्त
होने की उसकी कामना, प्यार पाने की चाहत, अधिकारों की मांग, स्वतंत्रता की अभिलाषा आदि तमाम
बातों का चित्रण इस ग़ज़ल में हुआ है।
मनुष्य की तरह व्यवहार चाहती है कभी
जो
शोषिताएं है, वह प्यार चाहती है कभी
प्रस्तुत ग़ज़ल में जहीर
कुरैशी ने नारी अस्मिता के प्रश्नों को उठाया है। आज के शिक्षित समाज में भी
स्त्री को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जहीर कुरैशी कहते हैं आजकल की
नारी मनुष्य के समान व्यवहार चाहती है। क्योंकि समाज में उसे जानवर की तरह यातनाएँ
झेलनी पड़ती है। कवि कहते हैं इनका हमेशा शोषण हुआ है कभी भी प्यार नहीं मिला। आज
वह प्रेम की भूखी है।
समाज ने नारी के चारों तरफ
पाबंदियों की दीवार खड़ी कर दी गई है। जिसके कारण उसका विकास नहीं हो रहा। आज वह
स्त्री दरवाज़ा खोल कर उनका बंधनों से बाहर आना चाहती है। गजलकार उसके मन का वर्णन
करते समय उसकी संवेदनशीलता पर प्रकाश डालते हैं। वह अपने पिता का घर छोड़ कर पति
के घर चली जाती है लेकिन अपने माता-पिता के हाल-चाल या समाचार लेती रहती है। मतलब
वह दोनों परिवारों से प्रेम करती है। हाल-चाल लेती है। उसका उसके शरीर पर भी
अधिकार नहीं है। पति चाहता है तो उसकी भावना के लिए वह अपना शरीर पति के हवाले कर
देती है। इसमें यह नहीं देखा जाता कि उसकी इच्छा अनिच्छा क्या है। उसे लगता है कि
मेरे जीवन पर मेरा अधिकार होना चाहिए। वह अत्यंत मग्न होकर नृत्य करती
है । वह प्रसिद्ध नृत्यांगना बनकर लोगों का मनोरंजन करती हैं उसे भी लगता है कि उसके शरीर से संगीत बजे
। मतलब अपनी शारीरिक इच्छाएं पूर्ण हो लेकिन इतनी सी बात उसके हाथ में नहीं है।
पतंगे देख रही है स्वतंत्रता का सपन
पतंगे
स्वप्न को साकार चाहती है कभी
ग़ज़लकार जहीर कुरैशी कहते
हैं डोर से बंधी हुई पतंग के समान है यह स्त्री। वह स्वतंत्र होना चाहती है।
बंधनों को तोड़ देना चाहती है। अपने सपनों को साकार करना चाहती है।
प्रस्तुत ग़ज़ल जिंदगी से
बड़ा जिंदगी का समर इस ग़ज़ल संग्रह से ली गई है। जहीर कुरैशी हिंदी के एकमात्र
ऐसे ग़ज़लकार है जिनकी ग़ज़लों में नारी विमर्श के अनेकानेक सशक्त शेर दृष्टिगोचर होते हैं। प्रस्तुत ग़ज़ल में ग़ज़लकारने नारी के मन को वाणी
देने का काम किया है। आधुनिक समाज में नारी को नए दृष्टिकोण से देखने का आवाहन इस ग़ज़ल में किया है।
गजल की तरह व्यवहार चाहती हैं कभी,
जो शोषिताएँ हैं, वो प्यार चाहती हैं कभी
हैं जिनके चारों तरफ वर्जना की दीवारें
वो नारियाँ भी खुला द्वार चाहती हैं कभी
पिता के घर से निकलने के बाद भी नारियाँ
पिता के घर का समाचार चाहती हैं कभी
जो पति की मरजी से खुद को परोसती आईं
स्वयं की देह पे अधिकार चाहती हैं कभी
जो नृत्य करती हैं पूरी तरह मगन होकर
वो अपने तन से भी झंकार चाहती हैं कभी
पतंगें देख रही हैं स्वतंत्रता का सपन
पतंगें स्वप्न को साकार चाहती कभी
( जिन्दगी से बड़ा जिन्दगी
का समर )


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