Tuesday, April 7, 2020

लीलाधर जगूड़ी- जो ठोकर खाते हैं



साठोत्तरी कविता 1960 से अब तक
       सन 1960 ई. के बाद हिंदी काव्य क्षेत्र में कई नई काव्य प्रवृत्तियाँ और आवाजें उभरी है। जिनमें प्रमुख है विद्रोही कविता, बोध कविता, अकविता, भूखी पीढ़ी की कविता, ठोस कविता, सहज कविता, शुद्ध कविता,अतिकविता,अगली कविता, गलत कविता आदि। आज हिंदी कविता की धारा वादमुक्त होकर अनेक दिशाओं में आगे बढ़ रही है। किंतु अभी तक इनमें से कोई भी धारा हिंदी साहित्य क्षेत्र में प्रतिष्ठित नहीं हो सकी है।
           साठोत्तरी कविता में मुख्य रूप से नई कविता के प्रति विद्रोह के स्वर दिखाई देते हैं।  साठोत्तरी कविता में रचना के नाम पर विखंडन और विद्रोह के स्वर ही अधिक है। इस काल के कवियों ने अपनी रचनाओं में आधुनिक जीवन की विसंगति और अर्थहीनता कि साहसपूर्ण अभिव्यक्ति की है। गिरते मानवीय मूल्य,यंत्रणामयी विवशता,भय,अकेलापन, अस्तित्व संकट की अनुभूति, यांत्रिक सभ्यता के खोखलेपन, अतीत और वर्तमान दोनों के प्रति विद्रोह इस कविता में दिखाई देता है। इस कविता में नवीन विषय अनुभूति में आस्था दिखाई देती है। विस्तृत मानवतावाद, अति नग्न  यथार्थवाद, वैयक्तिकता की प्रधानता इस कविता की विशेषताएं हैं। कवि धूमिल, लीलाधर जगूड़ी, नरेश सक्सेना, जगदीश चतुर्वेदी, चंद्रकांत देवताले, राजेश जोशी,मंगलेश डबराल,सुशीला टाकभौरे आदि कवि महत्वपूर्ण है। 

लीलाधर जगूड़ी- जो ठोकर खाते हैं

लीलाधर जगूड़ी आधुनिक कविता के एक महत्वपूर्ण कवि है। इनका जन्म उत्तराखंड में हुआ। लीलाधर जगूड़ी उन कवियों में आते हैं, जिन्होंने अनुभव और भाषा के बीच कविता को जीवित रखा है। अनुभव के आकाश में उड़ान भरने वाले वे हिंदी के एकमात्र ऐसे कवि है जिनके यहां शब्द किसी कौतुक या क्रीडा का उपक्रम नहीं है। वह एक सार्थक सृजनात्मकता की कोख से जन्म लेते हैं। बार-बार दोहराई गई, भोगी हुई जीवन पद्धति से दुहे गए अनुभव  को नए-नए रूपाकारों में व्यक्त करने का काम जगूड़ी वर्षों से कर रहे हैं।
 लीलाधर जगूड़ी ने सन 1960 के बाद की हिंदी कविता को एक नई पहचान दी है। उनके घबराए हुए शब्द, भय भी शक्ति देता है, अनुभव के आकाश में चांद आदि अनेक कविता संग्रह प्रसिद्ध है। साहित्य अकादमी जैसे श्रेष्ठ पुरस्कारों से उनको नवाजा गया है।
 जो ठोकर खाते हैंकविता में आज के नौजवान को प्रेरणा देने का काम कवि ने किया है। कवि कहता है ठोकर खाने वाला मनुष्य ही जीवन में सफल होता है। कवि के अनुसार जो ठोकर खाते हैं वही आगे बढ़ते हैं। जिस प्रकार बहता पानी ठोकर खाने के कारण प्रवाहित होता है। बिना गीत लिखे, बिना गीत गाए ठोकर खाने वाले लय, ताल एवं छंद से परिचित हो जाते हैं मतलब कवि का कहना है कि ठोकर खाने वाले व्यक्ति के जीवन में एक प्रकार का संगीत निर्माण हो जाता है। कवि आगे कहते हैं कि ठोकर पत्थर नहीं तो आदमी खाते हैं। जो जीवित होता है, संवेदनशील होता है या जो प्रवाह मान होता है वही ठोकर खाता है। और ठोकर खाने से गति बढ़ जाती है। ठोकर खाने के कारण नदी बहती है और हवाएं चलती है। जब पानी ठोकर खाता है।  बिनावाद्य के आवाज निकलती है। कवि का कहना है कि ठोकर खाने वाले व्यक्ति के जीवन में संगीत निर्माण होता है। आगे कहते हैं कि ठोकर खानेवाले  की नई भाषा होती है और उनकी भाषा से पता चलता है कि ठोकर खाया हुआ कौन है या ठुकराया हुआ कौन है।
ठोकर एक सम भूली हुई नई भाषा को जनम देती है
 यहीं पर ठोकर खाई हुई और ठुकराई हुई भाषा का
 पता पड़ जाता है
       कवि का कहना है कि जो ठोकर खाता है उसकी प्रतिक्रिया अलग होती है जिस ने ठुकराया है उसकी भाषा अलग होती है। कवि के अनुसार मनुष्य के संघर्षों का परिणाम उसकी अभिव्यक्ति पर होता है। जिसको ठोकर लगती है उसकी भाषा में एक प्रकार का आक्रोश दिखाई देता है।
           आगे कवि कहते हैं कि छोटी ठोकर ज्यादा आवाज़ नहीं करती लेकिन बड़ी ठोकर बहुत आवाज़ करती है। कवि के अनुसार जो ठोकर खाता है वह आगे बढ़ जाता है और जो ठोकर नहीं खाता वह एक ही स्थान पर पड़ा हुआ रहता है। कवि के अनुसार समाज में जीते वक्त संघर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण और आवश्यक है। अगर कुछ नया अलग आप कर रहे हैं तो ठोकर लगना लाज़मी है। ठोकर खाने के भय से जो संघर्ष नहीं करते उनका विकास नहीं हो पाता। जो डरते हैं वे वहीं रह जाते हैं। इसलिए ठोकर खाने से डरना नहीं चाहिए। मनुष्य को जीवन में ठोकर खाने की पीड़ा सहनी चाहिए तभी वह आगे बढ़ सकेगा।
           प्रस्तुत कविता में कवि लीलाधर जगूड़ी ने जीवन में सक्रिय रहना आवश्यक माना है। या ऐसा कह सकते हैं कि चलना ही जीवन है। और जो चलते रहते हैं उनको कभी भी किसी भी समस्या या परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इनसे हमेशा ताकत पाकर आगे बढ़ना चाहिए। जिस प्रकार झरने का या नदी का पानी आगे बढ़ता है।

जो ठोकर खाते हैं

जो ठोकर खाते हैं वे प्रवाह पा जाते हैं
बिना गीत लिखे , बिना गीत गाए
वे चाल के लय , ताल  और छंद से परिचित हो जाते हैं |

ठोकर पत्थर नहीं खाते
या तो आदमी खाते हैं
या नदियाँ खाती हैं या हवाएँ खाती हैं
पत्थर तो टकराते हैं
जो भी ठोकर खाते हैं  प्रवाह पा जाते हैं |

जहाँ पानी को ठोकर खानी पड़ती हैं
बिना वाद्यों के आवाज़ें निकल आती हैं

ठोकर एक सम्भली हुई नई भाषा को जन्म देती हैं
यहीं पर ठोकर खाई हुई और ठुकराई हुई भाषा का
पता पड़ जाता है

छोटी ठोकर लरजती है गरजती है बड़ी होकर
पत्थरों से टकराता है पानी
पत्थर वहीं पड़े रह जाते हैं
आगे बढ़ जाता है ठोकर खाया हुआ पानी
जो ठोकर खाते हैं वे प्रवाह पा जाते हैं |
-- लीलाधर जगूड़ी

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