Tuesday, April 7, 2020

राजेश जोशी -बच्चे काम पर जा रहे हैं

राजेश जोशी -बच्चे काम पर जा रहे हैं

राजेश जोशी हिंदी साहित्य के एक अत्यंत महत्वपूर्ण कवि है। आधुनिक हिंदी कविताओं में साहित्य अकादमी जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त करने वाले कवि राजेश जोशी है। राजेश जोशी जी ने कविता, कहानी, नाटक, अनुवाद तथा संपादन आदि बहुविधाओं का लेखन किया है। राजेश जोशी आज के कवियों में सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। वह कवि गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में श्रोताओं पर छा जाते हैं। क्योंकि उनकी कविताएं सहज संप्रेषणीय होती है। राजेश जोशी की कविता में सामाजिक यथार्थ और स्वप्न हाथ मिला कर आते हैं। उनके कुल पाँच कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं ।
 राजेश जोशी की कविता बच्चे काम पर जा रहे हैं बाल मजदूरी की व्यथा को चित्रित कर रही है। कवि लिखते हैं कि सुबह-सुबह बच्चे काम पर जा रहे हैं। बच्चे काम पर जा रहे हैं यह पंक्ति कवि के अनुसार इस समय की सबसे भयानक समस्या है। लेकिन आज का समाज, प्रशासन इतना संवेदनशील हो गया है कि यह पंक्ति एक साधारण विवरण के तरह लिखी जाती है बल्कि उसे एक सवाल के समान लिखना चाहिए। भारत में बाल मजदूरी को अत्यंत सामान्य ढंग से लिया जाता है किसी भी बच्चे का इस तरह काम पर जाना दुखद नहीं लगता।  कवि कहते हैं यह पंक्ति काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे इस तरह लिखनी चाहिए। मतलब सभी के मन में यह प्रश्न उठना चाहिए कि किस कारण उन बच्चों को काम पर जाना पड़ रहा है।
कवि कहते हैं इन बच्चों के लिए आज की स्थिति में क्या होना चाहिए? कि उन्हें खेलना चाहिए लेकिन वह खेल नहीं पा रहे हैं। इसलिए कवि कहते हैं कि क्या सारी गेंदे अंतरिक्ष में गिर गई है? यह गरीब मजदूरी करने वाले बच्चे पढ़ नहीं पा रहे हैं इसलिए कवि कहते हैं क्या सारी रंग बिरंगी किताबें दीमको ने खाई है। इन बच्चों को खेलने के लिए खिलौने नहीं मिल रहे इसलिए कवि कहते हैं क्या काले पहाड़ के नीचे खिलौने दब गए हैं? असल में इन बच्चों को जो काम पर जा रहे हैं उन्हें पढ़ना चाहिए लेकिन वह पाठशाला में न जाते हुए मजदूरी कर रहे हैं इसलिए कवि कहता है की पाठशालाओं की सब इमारतें क्या भूकंप से ढह गई है। कवि को इस बात का दुख है कि सारे मैदान बगीचे और घरों के आंगन इन बच्चों के लिए खत्म हो गए हैं। मतलब जहां खेला कूदा जाता है यह सारे स्थान इन बच्चों के लिए न के बराबर है।
 कवि कहते हैं अगर ऐसा होता कि सचमुच मैदान बगीचे नहीं होते तो कितना भयानक होता। लेकिन यह सारी चीजें आज मौजूद है। किताब, गेंद, पाठशाला,  खिलौने सब कुछ है लेकिन गरीब वर्ग के बच्चों को इनसे दूर रखा गया है और उन्हें काम पर भेजा जा रहा है। और यह सबसे दुखद बात है कि यह छोटे-छोटे बच्चे काम पर जा रहे हैं।
 इस प्रकार प्रस्तुत कविता में कवि राजेश जोशी जी ने बाल मजदूरी की व्यथा का चित्रण किया है। कवि के अनुसार अगर यह सारे बच्चे पढ़ने लगेंगे तभी देश का विकास हो सकता है जिस देश में बच्चों की शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता वह देश समृद्ध नहीं हो सकता। कितने दुख की बात है कि देश को स्वातंत्र्य मिलकर सत्तर साल हो गए लेकिन आज भी गरीब परिवारों के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा भी नसीब नहीं है। जिस आयु में खेलना कूदना और जीवन के मजे लेना होना चाहिए लेकिन ऐसी अवस्था में इन बच्चों को माता पिता की मदद करने के लिए काम पर जाना पड़ता है।  आज भी हजारों बच्चे बचपन में ही शारीरिक श्रम करने लगते हैं। आगे चलकर यही बच्चे गुनहगार,चोर बन जाते हैं। अगर उनको सही शिक्षा मिली तो वे देश का नाम रोशन करते हैं। बच्चों की इस महत्वपूर्ण समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट करते समय कवि लिखते हैं-
बच्चे काम पर जा रहे हैं
 हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
 भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना
 लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
 कवि को लगता है कि देश के हर नागरिक के मन में यह सवाल उठना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है। क्या हम अपने बच्चों को शिक्षित भी नहीं बना सकते? जब तक देश की गरीबी खत्म नहीं होती तब तक यह समस्या बनी रहेगी। क्योंकि बचपन में बच्चों को काम करना पड़ता है इसके पीछे उसके परिवार की आर्थिक स्थिति होती है। परिवार को आर्थिक रूप से सहायता करने के लिए ही बच्चों को काम पर जाना पड़ता है। कुल मिलाकर इस समस्या के पीछे देश की आर्थिक स्थिति काम करती है।



बच्‍चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे?

क्‍या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्‍या दीमकों ने खा लिया हैं
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्‍या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्‍या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें

क्‍या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन
खत्‍म हो गए हैं एकाएक
तो फिर बचा ही क्‍या है इस दुनिया में?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्‍यादा यह
कि हैं सारी चीज़ें हस्‍बमामूल

पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुज़रते हुए
बच्‍चे, बहुत छोटे छोटे बच्‍चे
काम पर जा रहे हैं।
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