Tuesday, April 7, 2020

मंगलेश डबराल- माँ की तस्वीर


समालोचन : भाष्य : मंगलेश डबराल का घर ...

मंगलेश डबराल- माँ की तस्वीर

कवि मंगलेश डबराल आधुनिक हिंदी कविता के एक महत्वपूर्ण कवि है। कवि बहुमुखी प्रतिभा के कवि हैं। मंगलेश डबराल जी ने कविता, कहानी, समीक्षा, पत्रकारिता में अपनी छाप छोड़ दी है। इसके साथ-साथ उन्होंने अनेक अंग्रेजी कविता का हिंदी में अनुवाद किया है। कवि ने राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय समारोह में अपने विचार प्रकट किए हैं। साहित्य अकादमी जैसा महत्वपूर्ण पुरस्कार उन्हें प्राप्त हुआ है।
माँ की तस्वीर कविता कवि मंगलेश डबराल की एक महत्वपूर्ण कविता है। इस कविता में कवि माँ का जीवन संघर्ष और घर परिवार के प्रति लगाव को स्पष्ट करते हैं।
 घर में माँ की कोई तस्वीर नहीं है। कवि एकांत में माँ की याद आने पर उसकी पुरानी तस्वीर ढूंढने लगते हैं। लेकिन उनकी उनको पता चलता है कि माँ की एक भी तस्वीर नहीं है। कवि सोचने लगते हैं तो उनको याद आता है कि जब कभी तस्वीर खिंचवाने का मौका आता है उस समय माँ उस स्थान पर मौजूद नहीं रहती। वह घर में कोई खोई हुई किसी चीज को ढूंढ रही होती है। कवि स्पष्ट करना चाहते हैं कि माँ को कभी भी ऐसी बातों में दिलचस्पी नहीं होती है। सज धज कर तस्वीर खींचे। वह निरंतर अपने कामों में लगी रहती है इसलिए वह कभी तस्वीर में दिखाई नहीं देती।
मां घर में खोई हुई किसी चीज को ढूंढ रही होती है
 या लकड़ी घास और पानी लेने गई होती है
 जंगल में उसे एक बार बाघ भी मिला
 पर वह डरी नहीं
 उसने बाघ को भगाया घास काटी घर आकर
 आग जलाई और सबके लिए खाना पकाया
वह जंगल में जाकर लकड़ी, घास और पानी लाने का काम निरंतर करती रहती है। उसे पता है कि उसने काम नहीं किया तो बच्चों को खाना नहीं मिलेगा । इसलिए वह निरंतर काम में लगी रहती हैं।
 एक दिन उसको जंगल में बाघ मिला लेकिन उसने निडरता से उसका सामना किया। बाघ की को भगा दिया। घास काटी। और घर पर आकर चूल्हा जलाया और सभी को खाना खिलाया। इस प्रसंग से कवि यह स्पष्ट करना चाहता चाहते हैं कि माँ अपने परिवार के लिए अनेक खतरे झेलकर परिवार का पालन पोषण करती है। उसे पता होता है उसके डर जाने से घर के लोग भूखे मर सकते हैं। इसलिए वह हमेशा कार्यरत रहती है।
 कवि कहते हैं मैं कभी भी जंगल नहीं गया। ना मैंने कभी घास काटे ना लकड़ी इकट्ठा की। कवि कहते हैं कि मैंने कभी आग नहीं जलाई। मतलब बचपन में कवि का पालन पोषण माने किया। कवि को श्रम के काम नहीं करने पड़े। बल्कि कवि जमाने से चली आ रही पुरानी नक्काशीदार कुर्सी पर बैठता रहा। कवि परंपरा से मिली सुविधाओं का फायदा उठाता रहा और आराम करता रहा। कवि यहां स्पष्ट करना चाहते हैं  है कि पुरुष होने का उसे फायदा मिला और वह परिश्रम से बचता रहा।
 कब या माँ के चेहरे पर जंगल की तस्वीर लकड़ी घास पानी की तस्वीर और खोई हुई हर एक चीज की तस्वीर दिखाई देती है। मतलब कवि के लिए मान जो जो कष्ट उठाए वह कवि को दिखाई देते हैं। कवि को ज्ञात होता है कि माँ ने कितना परिश्रम उठाया और उसकी तस्वीर नक्काशीदार कुर्सी पर बैठकर निकाली हुई तस्वीर से कहीं अधिक सुंदर है।
 इस प्रकार प्रस्तुत कविता में माँ की महत्ता को प्रतिपादित किया है



घर में माँ की कोई तस्वीर नहीं
जब भी तस्वीर खिंचवाने का मौक़ा आता है
माँ घर में खोई हुई किसी चीज़ को ढूंढ रही होती है
या लकड़ी घास और पानी लेने गई होती है
जंगल में उसे एक बार बाघ भी मिला
पर वह डरी नहीं
उसने बाघ को भगाया घास काटी घर आकर
आग जलाई और सबके लिए खाना पकाया

मैं कभी घास या लकड़ी लाने जंगल नहीं गया
कभी आग नहीं जलाई
मैं अक्सर एक ज़माने से चली आ रही
पुरानी नक़्क़ाशीदार कुर्सी पर बैठा रहा
जिस पर बैठकर तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं
माँ के चहरे पर मुझे दिखाई देती है
एक जंगल की तस्वीर लकड़ी घास और
पानी की तस्वीर खोई हुई एक चीज़ की तस्वीर

(1990-1991 में रचित)

आईचा फोटो

घरात आईचा एकही फोटो नाही
ज्यावेळी फोटो काढायचा प्रसंग यायचा,
घरात विसरलेली एखादी वस्तू शोधण्यात आई व्यस्त असायची,
किंवा जळण, गवत आणि पाणी आणण्यासाठी गेलेली असायची जंगलात,
एकदा तिला वाघ दिसला होता,
पण ती घाबरली नाही,
तिने वाघाला पिटाळून लावले,
गवत कापले,
घरी येऊन चूल पेटवली आणि
सगळ्यांसाठी जेवण तयार केले.

मी कधी गवत आणि जळण आणण्यासाठी जंगलात गेलो नाही,
कधी चूल नाही पेटवली,
मी परंपरेने चालत आलेल्या
जुन्या नक्षीदार खुर्चीत बसून राहिलो,
जिच्यावर बसून फोटो काढले जातात,
आईच्या चेहऱ्यावर मला दिसतो
एका जंगलाचा फोटो
जळण,गवत आणि पाण्याचा फोटो,
हरवलेल्या एका गोष्टीचा फोटो.





1 Comments:

At March 31, 2022 at 11:54 AM , Blogger Raju Zample said...

Very nice 👌

 

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