Tuesday, April 7, 2020

सुशीला टाकभौरे- विद्रोहिणी



सुशीला टाकभौरे- विद्रोहिणी 

सुशीला टाकभौरे हिंदी दलित साहित्य में जाना पहचाना नाम है। दलित स्त्री रचना कारों में आज वह अग्रणी स्थान पर हैं ।उनका जन्म मध्य प्रदेश में हुआ। उन्होंने समाज में दलित लोगों के साथ होने वाले भेदभाव का चित्रण अपने साहित्य में किया। कविता, नाटक, कहानी आदि विधाओं में उन्होंने लेखन किया।
 विद्रोहिणी कविता में कवयित्री नारी के ऊपर समाज द्वारा थोपी गई वर्जनाओंका विरोध करती है। कवयित्री लिखती है माता और पिता ने गंगा के समान प्रवाहमयी पैदा किया था । लेकिन परिवेश ने लंगड़ा बना दिया। मतलब कवयित्री का कहना है कि समाज ने प्रतिबंध लगाकर नारी के जीवन को अपाहिज बनाया है। उसे निश्चित परिपाटी पर चलने के लिए कहा गया। अनेक बंधन डाल कर समाज में उसकी शक्ति छीन ली और बैसाखियों के सहारे उसे चलना पड़ा। जीवन में अनेक मुकाम आए जहां तक वह किसी तरह पहुंच गई।
समय बदल गया। आज उसे वह बैसाखियाँ चरमराती नजर आती है। मतलब समाज के द्वारा बनाए गए नियम और आधार आज की स्थिति में कमजोर पड़ जाते हैं और कवियत्री को लगता है कि इन नियमों को तोड़ दूं। उस पर होने वाले अन्याय के कारण कवियत्री के ह्रदय में आग लगी हुई है। उसकी आत्मा भटकती है। भावनाओं का धुआँ कंठ द्वार को चीर कर बाहर आ जाता है। मतलब उस पर होने वाले अन्याय का वह प्रतिरोध करती है। और सफेद कागज पर कविता के रूप में या कहानी के रूप में लिखने लगती है। आज कवियत्री का रोम-रोम विद्रोह की ध्वनि से गूँजने लगा है। और अनेक विचार मन में निर्माण होते हैं। वह सोचने लगती है कि क्या विद्रोह प्रकट करना गुनाह है? क्या वह मानवता के खिलाफ है? क्या वह समाज के खिलाफ है? समाज के दिए हुए नियमों और प्रचलित परिपाटी को त्याग कर वह विद्रोही बनते हुए इधर उधर भागती है और विद्रोहिणी बनकर सारी दिशाओं में अपनी आवाज को फैलाती है। वह कहती है मुझे अनंत आसमान चाहिए। आसमान की खुली छत चाहिए। कवयित्री कहती है कि मुझे इन बंधनों से मुक्ति चाहिए।
 कवयित्री के अंदर जो घुटन हैं उस घुटन को वह अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्त करना चाहती है। उसका कहना है कि उसे बंधनों में ना डालकर मेरा विकास होने में मदद करें।कवयित्री भारत के सभी स्त्रियों का पक्ष लेकर उनकी स्वतंत्रता की कामना करती हैं। 
मुझे अनंत असीम दिगंत चाहिए
 छत का खुला आसमान नहीं
 आसमान की खुली छत चाहिए
 मुझे अनंत आसमान चाहिए
इस प्रकार विद्रोहिणी कविता में हम देखते हैं कि आज नारी अपनी आवाज बुलंद करने के लिए तड़पती है । उसके अंदर वह शक्ति है जो वह दिखाना चाहती है। प्रत्येक स्त्री कभी न कभी इस अनुभव से गुजरती है जब उसे अपने व्यक्तित्व में खुलकर प्रकट होने के कारण समाज की तरफ से जाने क्या-क्या कहा जाता है। इसी भाव बोध को कवित्री ने इस कविता में सशक्त ढंग से व्यक्त किया है। 



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