Tuesday, April 7, 2020

सुदामा प्रसाद पांडेय- आज मैं लड़ रहा हूँ


सुदामा प्रसाद पांडेय- आज मैं लड़ रहा हूँ 

कल सुनना मुझेइस काव्य संग्रह में आज मैं लड़ रहा हूं कविता संग्रहित है। प्रस्तुत कविता का समावेश बी.ए.भाग एक के साहित्य सुरभि पाठ्यक्रम की किताब में अध्ययन के लिए किया गया है। हिंदी कविता में धूमिल को संघर्ष का कवि कहा जाता है। आजीवन उसे जीवन और कविता दोनों में ही संघर्ष से गुजरना पड़ा। संघर्ष के धरातल पर उसे निराला और मुक्तिबोध की कड़ी में गिना जाता है। इन तीनों को ही अपने ढंग से दोहरे संघर्ष से दो-चार होना पड़ा।
 धूमिल का जन्म वाराणसी जन पद के एक साधारण से गांव खेवली में 1936 को हुआ। अत्यंत साधारण परिवार से जन्मे धूमिल को गरीबी का सामना करना पड़ा। बारह वर्ष की अल्पायु में ही धूमिल का विवाह हो गया। परिवार के पालन पोषण के लिए वे कोलकाता चले गए। जहां उन्होंने लोहा ढोने का भी काम किया।आज मैं लड़ रहा हूँकविता धूमिल के संघर्ष को रेखांकित करने के साथ उनकी भावी कविता के स्वर को भी मुखरित करती है। धूमिल की कविता संघर्ष के प्रति आशावाद का प्रतीक है। समकालीन परिवेश में हंसी के विरुद्ध जंजीरे खनखना रही है तथा परस्पर मानवीय रिश्ते भी अवसरवाद के मोहताज होकर अपना मुहावरा बदलने की फिराक में है। मतलब चारों ओर आज अज्ञान अंधेरा है और लोगों के हाथों में खून लगा है यानी लोग एक दूसरे के शोषण को ही अपने स्वार्थ के लिए उत्तम अवसर मानते हैं। आज हमारी उपलब्धि के नाम पर क्या है? 
वहां पालने में नहीं- रक्त लथपथ
 कराहों  की बगल में पड़ा है। 
जो है स्पष्ट है। आज के परिवेश में आदमी घायल है और चौराहों के बीच पड़ा है, क्योंकि घायल होकर कराहने के सिवाय और कोई चारा नहीं है। यह तस्वीर है उस आदमी की जो अपने श्रम से सींच कर अपने घर और परिवार को खुशहाल बनाने में प्रयत्नशील है। उसके घर बच्चे भूखे हैं। माँ का चेहरा भी पत्थर हो गया है और परिवार का पालन करता पिता काठ की तरह निस्पंद एवं निर्जीव होने के लिए विवश है। सारा घर अभाव की आग में जल रहा है। समकालीन परिवेश में सामान्य आदमी का जीवन कितना मुश्किल है। धूमिल बहुत कम शब्दों में इसका संकेत देते हैं।
बच्चे भूखे हैं:
 मां के चेहरे पत्थर,
 पिता जैसे काठ: अपनी ही आग में
 जले है जो सारा घर
इसी परिवेश में दूसरी ओर वे पेशेवर गुलाब यानी पेशेवर राजनीतिज्ञ एवं उनके सहकारी है, जिनके कृत्रिम जीवन में बसंत और कविता की नसों में बहते हुए खून को खारिज कर दिया है और वह जरूरत की जगह जहमत बन गया है। यह संकेत उस वर्ग भेद की ओर है, जिसमें सामान्य जन के शोषण पर टिके वे लोग हैं जो व्यवस्था को अपने पक्ष में करने के षड्यंत्र में संलिप्त है। शोषण करता उनका बनावटी जीवन प्रकृति और उसमें अद्भुत कविता के लिए भी घातक है ऐसी स्थिति में कविता से मनोरंजन की मांग कितनी प्रासंगिक है, इसके विस्तार में जाना जरूरी नहीं।
           ऐसे माहौल में युवा वर्ग से अपेक्षा की जाती है कि उनमें वह शक्ति होती है कि वह इस माहौल को बदल सके। परिवर्तन के लिए अग्निचक्र की अपेक्षा होती है जो नदारद है। इतिहास में भूखे लोगों ने ही क्रांति पैदा की है, उसका बोध भी कहीं नहीं दिखता। बल्कि होता यह है कि पीले पत्ते पतझड़ के शिकार होते हैं यानी कमजोर लोग अकाल काल कवलित होते हैं।लड़कियाँ अपने नकली यौवन के साथ चुटकुलों की तरह घूमती है अर्थात वस्तुस्थिति से बे खबर अपने प्रसाधन में डूबी हुई चुटकुलेबाजी में ही व्यस्त रहती है और युवा वर्ग का आक्रोश भी नकली दाँत की तरह नकली है। व्यवस्था ने सबको केंद्रच्युत कर दिया है।
           परिणाम क्या हुआ है? खून की रपट पढ़ने वाले जबड़े भी जाम हैं यानी खूनी हद गुंडों के विरुद्ध आवाज़ उठाने में असमर्थ है। लेकिन धूमिल एक अलग किस्म के युवा कवि है। उनकी अंतरात्मा जो आवाज़ देती है उसे सुनते हैं। धीरे-धीरे उनके मानस पटल पर उत्तर भी उसी तरह उभरता है जिस तरह काल कोठरी की दीवार पर शब्द उभरते हैं। तब उनकी संघर्ष के प्रति आस्था दृढ़ होती है और परिवेश परिवर्तन का एक सक्रिय संकल्प दृढ़ होता है। वह कह उठते हैं, कल सुनना मुझे यानी मेरी सक्रियता रंग लाएगी। उस समय जब निस्तब्ध दूध पीते बच्चे के चेहरे पर दूध के सफेद फूल झड़ रहे होंगे अर्थात दूध पीता बच्चा भी अपने चेहरे से खुशहाली बिखेरेगा। घर के चौके में लोग गोश्त के साथ रोटी खा रहे होंगे अपने श्रम की कमाई से खाने में लोग खुश होंगे तथा परिवार और भाईचारे की भावना सबके मन में  होगी। जब तक यह स्थिति नहीं आती तब तक कवि को लड़ना है और वह लड़ता रहेगा।
           कविता का कथ्य स्पष्ट है जब तक समकालीन परिवेश में बदलाव नहीं होता कवि खुशहाली के गीत नहीं गा सकता। उसे तो एक सजग युवा की तरह वर्ग भेद को मिटाने के लिए संघर्ष करना ही  इष्ट है। इसलिए कवि कहता है आज मैं लड़ रहा हूं।
           इस प्रकार प्रस्तुत कविता में कवि सुदामा प्रसाद पांडे मिलने कवि को व्यवस्था से लड़ कर समाज को शिक्षित और सुखी बनाने का प्रयास करना चाहिए इस प्रकार की विचार प्रकट किए है।

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