Monday, April 6, 2020

जयशंकर प्रसाद- बीती विभावरी जाग री !

जयशंकर प्रसाद- बीती विभावरी जाग री !

बीती विभावरी जाग री ! छायावादी कविता है। जयशंकर प्रसाद के लहर काव्य संग्रह में इस कविता का समावेश किया गया है। जयशंकर प्रसाद को छायावाद के प्रवर्तक कवि माना जाता है। कामायनी यह उनका महाकाव्य है। जयशंकर प्रसाद एक प्रतिभा संपन्न श्रेष्ठ कवि थे। संस्कृत,हिंदी, अंग्रेजी,उर्दू और फारसी का उन्होंने अध्ययन किया था। जयशंकर प्रसाद को अनुभूतियों के कवि कहा जाता है। उन्होंने कविता के अतिरिक्त नाटक,उपन्यास,कहानी और समीक्षात्मक निबंध लिखकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है।
बीती विभावरी जाग री ! कविता को जागरण गीत कहा जाता है। इस कविता में कवि जयशंकर प्रसाद जी ने उषाकाल का सुंदर मनोहर वर्णन किया है। अलंकारों का प्रयोग करके उसे साकार बना दिया है। रात बीतने लगी है। आकाश रूपी पनघट में तारा रूपी स्वर्ण घट उषा रूपी नागरी सुंदर स्त्री डुबो रही है तात्पर्य यह कि चारों ओर सुनहरा वातावरण फैल गया है। उष:काल  होने से एक-एक स्वर्ण तारा डूबने लगा है। भोर के समय सारे पक्षीगण कल कल स्वर में चहचहाहट करने लगे हैं। फूलों का पूर्ण केसर आंचल जैसा वायु पर डोलने लगा है। लता वेलियों पर मधुर रसपूर्ण कलियां खिल गई है। लगता है कि मानो लताएं ही नाविन्यपूर्ण मधुर रस की गगरियाँ ही भर भर कर ले  आई है।
 सारा वातावरण ही उत्साह पूर्ण होता है। चारों ओर आनंद ही आनंद फैल गया है।
 अंबर याने आसमान को पनघट या जलाशय का सुंदर रुप दिया है। नीला आकाश मानो नीले जल से लबालब भरा हुआ सा लगता है। उषा को नागरी सुंदर स्त्री रूप में दिखलाया है। वह सुंदरी तारा रूपी स्वर्ण गगरियाँ आसमान के जलाशय में डुबो रही है ऐसी सुंदर यथार्थ कल्पना की है । इसमें  रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग किया है। निर्जीव वस्तुओं को भी सजीव साकार बनाकर उस पर मानवीय भावों का आरोप किया है। चेतनगुणोक्ति अलंकार का भी सुंदर प्रयोग किया है।
 तात्पर्य यह कि प्रसाद ने उष:काल का अलंकारिक उत्साह पूर्ण सुंदर वर्णन किया है। 
अधरों में राग अमंद पिये
 अलकों में मलयज बंद किये 
 तू अब तक सो ही है आली !
 आंखों में भरे विहाग री !
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि प्रसाद जी ने प्रकृति का मानवीकरण बहुत ही बढ़िया ढंग से किया है। कवि कल्पना करता है कि अपने होठों में संगीत भरकर और बालों में मलय की सुगंधी लेकर वह सोई है जिसकी आंखों में विहाग राग भरा हुआ है।

बीती विभावरी जाग री!

अम्बर पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा नागरी!

खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा
किसलय का अंचल डोल रहा
लो यह लतिका भी भर ला‌ई-
मधु मुकुल नवल रस गागरी

अधरों में राग अमंद पिए
अलकों में मलयज बंद किए
तू अब तक सो‌ई है आली
आँखों में भरे विहाग री!

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